॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग ।*
*मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥३१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस जीवित अवस्था में ही ‘‘मैं हूँ, मेरी है’’, इसको परमेश्वर की विरहीरूप अग्नि में जला दो । यह अनात्म - वासनारूप अहंकार, इसको अन्तःकरण से दूर कर । और साहिब परमेश्वर के नाम स्मरण में स्थिर रहो ॥३१॥
जाके उर तैं उठि गई, मैं तूं बड़ी बलाइ ।
तुलसी ताके भाग की, महिमा कही न जाइ ॥
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*दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।*
*मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥३२॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिसके अन्तःकरण में, मैं कहिए अनात्म - अहंकार नहीं है, तब एक अनात्म - स्वरूप परमेश्वर ही है वहॉं । और जब मैं उत्पन्न हो जावे, तब तूं का भाव भी उत्पन्न होता है, अर्थात् संसार अध्यास भी प्रकट हो जाता है । जब मैं और तूं का भेद ज्ञान मिट गया, तब जो ब्रह्मरूप पहले था, सोई ब्रह्मरूप अपने को निश्चय करता है ॥३२॥
मैं मांही माया भई, मैं नांहीं तब नांहि ।
रज्जब मुक्ता मैं बिना, बंधन मैं ही मांहि ॥
(क्रमशः)

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