शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

= च. त./२८-९ =



*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” २८-२९)*
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काजी - हाथ भयो दुख कीलित, 
हाय पुकारत पीडित जाई । 
कोसत जावत, चीखत, तड़फत, 
दादु जु दम्भी रु काफिर जाई । 
आपनि आग हिं आप जर्यो शठ, 
संत अनादर, हरि न सुहाई । 
तीन हु मास महा दुख पावत, 
मृत्यु भई, यमलोक पठाई ॥२८॥ 
काजी के हाथ में दर्द बढ़ने लगा । वह ऐसा जड़ हो गया, मानो कील ठोक दिया हो । काजी हाय - हाय पुकारने लगा, चीखने चिल्लाने लगा, तड़फता हुआ दादूजी को कोसने लगा । यह दादू दम्भी(पाखंडी) है, काफिर - जाया है । वह काजी अपनी ही ईर्ष्या - द्वेष जनित क्रोधाग्नि में जलने लगा । संत का अनादर श्री हरि को सहन नहीं हुआ । ईश्वर कोप से तीन मास तक अत्यन्त असह्य दु:ख से तड़फता रहा, अन्त में मरकर यमलोक चला गया ॥२८॥ 
तीन माह काजी दुख पायो, 
काजी मरत बहुत पछतायो । 
जो कोउ संतहिं बैर धरे शठ, 
ताहिं विनाश भये तिहिंबारा । 
ज्यों प्रहलाद हिं दुष्ट दियो दुख, 
खंभहि फाड़ि निशाचर मारा । 
दास कबीर दियो पतसा दुख, 
सिंह स्वरूप भयो निसतारा । 
त्योंहि दयालु - सहाय करी हरि, 
काजि विनाश भयो परिवारा ॥२९॥ 
साधु - संतो से जो वैर विद्वेष करता है, उस शठ का विनाश निश्चित है । जैसे प्रहलाद को दु:ख देने पर श्री हरि ने खंभ फाड़कर नृसिंह रूप से हिरण्यकश्यप निशाचर को मारा । कबीरदास जी को दु:ख देने पर बादशाह को सिंह रूप से डराकर संत का उद्धार किया । उसी तरह श्री दादू दयाल जी की भी श्री हरि ने सहायता की, काजी का घर परिवार नष्ट हो गया ॥२९॥ 
(क्रमशः)

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