*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ४६)*
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*मनोहर छन्द*
परचा प्रथम देत, सिन्धु में धरत ध्यान,
छींत सिकदार लिखी, अंक पलटाये हैं ।
काजी आप दीन्ही कौंस, ताहि समय गिरयो कर,
तीन मास पाय दुख, दोजख को पाये हैं ।
दारा सुत जरे घर, गज शीश हाथ धर,
खोजा को स्वरूप दोय प्रकट दिखाये हैं ।
सात घर नूता जीम सात ही स्वरूप धरे,
माधो कहे परचा ऐसे सत्य ही सुनाये हैं ॥४६॥
झील मध्य ध्यान धरते हुये प्रथम परचा - सिकदार के आदेश का अक्षर पलटकर दिया । दूसरा परचा काजी द्वारा थप्पड़ मारने पर उसका हाथ स्थंभ कर दिया । उसका हाथ गल गया, वह तीन मास तक दु:ख पाकर मर गया । तीसरा परचा - उर्मायल काजी का घर परिवार जलाकर राख कर दिया । चौथा परचा - मदमत्त हाथी के सिर पर हाथ धर कर दिया । खोजा बालिंदखान को कारागार - कोठरी में बाहर भीतर दो रूप दिखाकर पाँचवा परचा दिया । सात घरों में एक साथ निमंत्रण जीमकर छठा परचा दिया । सातवाँ परचा - निन्दक जनों का अन्तर्दाह कमण्डलु जल से शांत करके दिया ।
माधवदास कहते हैं कि - ये चमत्कार परिचय सबके सामने हुये हैं, अत: सत्य हैं, जग - विख्यात हैं । मैंने उन्ही का वर्णन करके सुनाया है ।
इति माधवदास विरचिते श्री सन्तगुणसागरामृत साँभर लीला वर्णनो
चतुर्थ - तरंग सम्पूर्ण ॥४॥
(क्रमशः)

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