॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*दादू आपा मेटे एक रस, मन हि स्थिर लै लीन ।*
*अरस परस आनन्द कर, सदा सुखी सो दीन ॥४९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जो निष्कामी सेवक है, वह अपने अनात्म अहंकार को त्यागकर, राम नाम का स्मरण करता हुआ, अपने मन को संकल्प - शून्य बनाकर, लय वृत्ति द्वारा परमेश्वर के स्वरूप में अरस - परस कहिये, ओत - प्रोत भाव को प्राप्त होकर सदैव आनन्द में मग्न रहते हैं ॥४९॥
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*स्मरण नाम निस्सशंय*
*हम हिं हमारा कर लिया, जीवित करणी सार ।*
*पीछे संशय को नहीं, दादू अगम अपार ॥५०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सर्व ब्रह्मवेत्ता, मुक्त पुरुष, स्वस्वरूप अनुभव करके जीवनमुक्त होते हैं और निस्संशय भाव से ब्रह्मानन्द में ही मग्न रहते हैं । वे पीछे के लिये कोई काम बाकी नहीं रखते हैं अर्थात् आवागमन से मुक्त होकर ब्रह्मलीन हो जाते हैं ॥५०॥
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*मध्य निरपक्ष*
*माटी मांहि ठौर कर, माटी माटी मांहि ।*
*दादू सम कर राखिये, द्वै पख दुविधा नांहि ॥५१॥*
इति जीवित मृतक का अंग सम्पूर्ण २३ ॥साखी ५१॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! दीन गरीबी भाव को धारण करके अहंकार भाव को छोड़ें और जीवित - मृतक होकर शरीर रूप मिट्टी और मृतिका को सम कहिये, कारण कार्य को एकरूप करके जानें । फिर जिनके अन्तःकरण में, अनात्मा में, आत्म - भाव की स्फुरणा मात्र भी कभी नहीं फुरती है, उनके अन्तःकरण में द्वैत बुद्धि और संसारभाव समाप्त हो जाता है अर्थात् सर्वत्र बह्म - प्रकाश ही भान होता है ॥५१॥
इति जीवित मृतक का अंग टीका सहित सम्पूर्ण २३ ॥साखी ५१॥
(क्रमशः)

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