॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ ।*
*सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥३७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर की प्राप्ति के लिये विरहीजनों के शरीर के मांस का तो खून हो जाता है । विरह अग्नि से तप कर खून का पानी हो जाता हैऔर शरीर की हड्डियां, सूखे आटे की तरह भीतर ही भीतर बिध करके चून हो जाती हैं, लक़ड़ी की भांति । ऐसे मुमुक्षु विरहीजनों को परमेश्वर प्राप्त होता है । अथवा प्रथम मॉंसरूप अहम्त्व को भूलकर, सतगुरु के उपदेश में स्थित होकर और फिर प्रेमाभक्ति में लीन हैं वे पुरुष, अस्थिरूप शरीर के अध्यास को भूलकर, आटा कहिये, जीवत मृतक, सब गुणों को पीसकर, आत्मा का साक्षात्कार करते हैं और फिर विरह की कसौटी द्वारा विरहीजन, शरीर को लोही, मांस, पानी रूप, जो पार्थिव शरीर है, वह अपने स्वभाव को बदलकर, तेजोमय होकर प्रकाशता है, ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥३७॥
मंकण ऋषि के जल भया, नाचा शिव समझाइ ।
त्यूं रज्जबजी ने कही, गुरु आज्ञा इक पाइ ॥
दृष्टान्त ~ मंकण ऋषि चिरकाल से तपस्या कर रहे थे । एक दिन उनके अंगूठे में चोट लगी, तब उसमें से खून की बजाय पानी निकला । उसे देखकर अपनी तपस्या को सर्वश्रेष्ठ मानकर हर्ष से नाचने लगे । तब देवताओं के कहने पर शंकरजी मंकण के पास जाकर नाचने का कारण पूछने लगे । मंकण बोले - तपस्या करते - करते मेरे रक्त का पानी हो गया । तब शंकर ने कहा - मेरी ओर देखो । मेरी तो अस्थियों का भी आटा हो गया है । शंकर ने अंगूठा झड़काया तो उसमें से सफेद आटा निकला । यह देखकर मंकण ऋषि का तप - गर्व दूर हो गया ।
भावार्थ - मांस रूपी ममता, लोही रूपी लोभ, अस्थि रूप अहंकार नष्ट होने पर ही साधक जीवित मृतक हो सकता है और प्रभु को प्राप्त कर सकता है । गुरु की आज्ञा पाकर रज्जबजी ने भी ऐसी ही साधना करके शिष्यों को दिखाई थी ।
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*तन मन मैदा पीसकर, छांण छांण ल्यौ लाइ ।*
*यों बिन दादू जीव का, कबहूँ साल न जाइ ॥३८॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस जीवित अवस्था में ही तन - मन के गुणों को मैदा की भांति पीसकर, निर्जीव बनाकर, विवेक द्वारा ‘छांण छांण’ कहिये, ब्रह्म विचार कर - करके, स्वस्वरूप में लय लगाकर, जीव आवागमन के दुःख से मुक्त हो जाता है । ऐसी साधना किये बिना, जीव का जन्म - मरण नहीं छूटता ॥३८॥
गुण तन मन के जीतिये, विचार सदा ल्यौ लाइ ।
सुन्दर याही जुगति बिन, साल मरम नहिं जाइ ॥
(क्रमशः)

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