#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३४-३५)*
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**सांभर में सभी नतमस्तक मस्त हाथी छोड़ा**
**मनोहर छन्द**
मदिरा मतंग पाय, मसतानो गज लाय,
तुरक हंकार देत, डारत अटारी है ।
हटनाल डारी जब, दशों दिशा दौरे तब,
नगर तें जात वन ताल को निहारी है ।
स्वामी जु उगत रवि, निधि तें निकसि परे,
आवत मतंग पास, स्वामी तपधारी है ।
स्वामी को निवायो शीश, धर्यो तांके हाथ शीश,
पाँव रज सूंड भरि शीश पर डारी है ॥३४॥
तुर्क बालिंद खान ने एक मदिरामस्त हाथी को दादूजी के मार्ग में छोड़ दिया । वह अटारियाँ तोड़ता हुआ आगे बढ़ा । लोग डरकर भागने लगे । नगर गलियाँ छोड़कर वन और सरोवर किनारे पहुँच गये । उसी समय सूर्योदय होने पर श्री दादूजी प्रतिदिन की भाँति नगर की तरफ चल पड़े । सामने मतवाला हाथी आ गया । तपस्वी स्वामीजी को देखकर हाथी ने शीश झुकाया, संत चरणों की रज सूंड में भरकर अपने सिर पर डाली । स्वामी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा ॥३४॥
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**मतवाला हाथी श्री दादू जी के चरणों में गिरा**
**इन्दव छन्द**
वापिस थान मतंग चल्योपुर,
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३४-३५)*
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**सांभर में सभी नतमस्तक मस्त हाथी छोड़ा**
**मनोहर छन्द**
मदिरा मतंग पाय, मसतानो गज लाय,
तुरक हंकार देत, डारत अटारी है ।
हटनाल डारी जब, दशों दिशा दौरे तब,
नगर तें जात वन ताल को निहारी है ।
स्वामी जु उगत रवि, निधि तें निकसि परे,
आवत मतंग पास, स्वामी तपधारी है ।
स्वामी को निवायो शीश, धर्यो तांके हाथ शीश,
पाँव रज सूंड भरि शीश पर डारी है ॥३४॥
तुर्क बालिंद खान ने एक मदिरामस्त हाथी को दादूजी के मार्ग में छोड़ दिया । वह अटारियाँ तोड़ता हुआ आगे बढ़ा । लोग डरकर भागने लगे । नगर गलियाँ छोड़कर वन और सरोवर किनारे पहुँच गये । उसी समय सूर्योदय होने पर श्री दादूजी प्रतिदिन की भाँति नगर की तरफ चल पड़े । सामने मतवाला हाथी आ गया । तपस्वी स्वामीजी को देखकर हाथी ने शीश झुकाया, संत चरणों की रज सूंड में भरकर अपने सिर पर डाली । स्वामी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा ॥३४॥
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**मतवाला हाथी श्री दादू जी के चरणों में गिरा**
**इन्दव छन्द**
वापिस थान मतंग चल्योपुर,
जा अपनी निज ठोर खरी है ।
दादु दयालु गये पुर भीतर,
दादु दयालु गये पुर भीतर,
संत सदा गुण गाय हरी है ।
तुर्क संताप भयो दुख पावत,
तुर्क संताप भयो दुख पावत,
देखि मतंग हि रीष करी है ।
केतिक काल गये गुण गावत,
केतिक काल गये गुण गावत,
संतन सूं शठ बैर धरी है ॥३५॥
मदोन्मत हाथी शांत होकर अपने ठिकाने चला गया । दयालु संत नगर में पधारे । सभी उनका गुणगान करने लगे । संत हरिकथा में रस लेने गये । यह जानकर तुर्क बहुत दुखी हुआ, उसने अपना गुस्सा हाथी पर उतारा, उसे मारा - पीटा । संत हरिगुण गाते रहे, कथा करते रहे, वह शठ वैर - विरोध करता रहा । कुछ समय यों ही बीत गया ॥३५॥
(क्रमशः)
मदोन्मत हाथी शांत होकर अपने ठिकाने चला गया । दयालु संत नगर में पधारे । सभी उनका गुणगान करने लगे । संत हरिकथा में रस लेने गये । यह जानकर तुर्क बहुत दुखी हुआ, उसने अपना गुस्सा हाथी पर उतारा, उसे मारा - पीटा । संत हरिगुण गाते रहे, कथा करते रहे, वह शठ वैर - विरोध करता रहा । कुछ समय यों ही बीत गया ॥३५॥
(क्रमशः)

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