बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

= च. त./३६-७ =


*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३६-३७)* 
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**बलीन्द खान की बुद्धि खराब** 
बालिंद खान पचीस पठै शठ, 
स्वामि हु पैठ गये बतलाये । 
लाय खरो कर ताहिं सुनावत, 
खोजहु बूझत कहुँ ते आये । 
कौन कला सिकदार बिगारत, 
काजिन मारि महासुख पाये । 
कौन कला सुत नारि जरै सब, 
कौन अजामत मोहि दिखाये ॥३६॥ 
पश्चात् बालिंद खान ने पच्चीस सिपाही भेजे, और दादूजी को पकड़कर कोतवाली बुलवाया । सामने खड़ा करके खोजा से पुछवाया कि - तू कहाँ से आया है ? तूने कौनसी कला दिखाकर सिकदार को बिगाड़ दिया, किस करामात से काजी का घर बार जला दिया ? एक काजी को तो मार भी दिया, और बड़े खुश हो रहे हो । तुझमें कोई करामात है तो मुझे दिखा ॥३६॥ 
**श्री दादू जी का भाक्सी में रखना** 
तूं नहिं जानत तुर्कन को तप, 
शाह अकैंबर को डर भारी । 
संत कहें - डर है हरि को इक, 
तोरे मदान्ध रहे दिन चारी । 
यों सुनि भाखसि मांहि धरे शठ, 
बांध कपाट किये जुड़ि भारी । 
ज्यों दुख - बालक, मात भये दुख, 
संत दुखी तब दु:खि मुरारी ॥३७॥ 
तूं तुर्को का पराक्रम प्रभाव नहीं जानता ? क्या तुझे अकबर बादशाह का भी डर नहीं ? संत बोले - मुझे तो केवल श्री हरि का डर है, वही जगत् का एकमात्र बादशाह है । तेरा मदान्ध दोष तो चार दिन का है । यह सुनकर शठ ने दादूजी को बांधकर भाखरी(कारागार - कोठरी) में डाल दिया, भारी कपाट में बन्द कर दिया । जैसे बालक को दु:खी देखकर माता दु:खी हो जाती है, वैसे ही संत को दु:खी देखकर श्री हरि भी दु:खी हो गये ॥३७॥ 
(क्रमशः)

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