गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

= जीवित मृतक का अंग २३ =(४१/४२)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*काटे ऊपर काटिये, दाधे को दौं लाइ ।*
*दादू नीर न सींचिये, तो तरुवर बधता जाइ ॥४१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस मनुष्य शरीर में ही नाना प्रकार की वासनारूप इस वृक्ष को वैराग्य रूप कुल्हाड़े में पुनः पुनः काटिये । सत्संग और विरह रूपी अग्नि से अहंकार को जला कर पुनः पुनः जलाते रहना और अज्ञानरूपी वार्ताओं के श्रवण रूप पानी से नहीं सींचना । तभी आत्म परिचय प्राप्तिरूप वृक्ष, तत्त्वज्ञान वृद्धि को प्राप्त होवेगा ॥४१॥
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*दादू सबको संकट एक दिन, काल गहैगा आइ ।* 
*जीवित मृतक ह्वै रहै, ताके निकट न जाइ ॥४२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सबको कहिये, प्राणी मात्र को, एक रोज क्रम से काल खाएगा । परन्तु जो महापुरुष जीते ही मृतकतुल्य, निर्वासनिक ब्रह्म स्वरूप होंगे, उनके काल समीप भी नहीं जायेगा ॥४२॥ 
घर जालै घर ऊबरै, घर राख्यां घर जाइ । 
एक अचंभा देखिया, मड़ा काल नैं खाइ ॥ 
(क्रमशः)

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