*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३८-३९)*
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**भाकसी के अन्दर और बाहर दो रूप**
दूर कपाट भये सब देखत,
बाहर भीतर दो रूप धारे ।
दादूजी बाहर दादुजी भीतर,
यौं अरज लखी डरि करि सारे ।
खोजहु बेगि पर्यो चरणां मधि,
नांहि लखी गति देव ! तुम्हारे ।
साहिब रूप खुदाइ सचा तुम,
पीर ! गुन्हां करु माफ हमारे ॥३८॥
उनकी माया से सब कपाट खुल गये । श्री दादूजी के दो रूप दिखने लगे, एक कारागार - कोठरी के भीतर, दूसरा बाहर । यह आश्चर्य देखकर सब डरने लगे । खोजा शीघ्रता से चरणों में गिरकर माफी मांगने लगा । बालिंदखान हाथ जोड़कर अर्ज करने लगा - हे देव ! आपकी गति मैं नहीं जान सका । आप साहिब रूप हो, खुदा समान सच्चे पीर हो, मेरे गुनाह माफ करो ॥३८॥
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**बलीन्द खान चरणों में गिरकर माफी मांगी**
दादु कहें - तुम जीव दया करु,
नांहि डरो इक राम भजीजे ।
बीच के रोजे छाड़ि कतेब हु,
संत प्रताप हरिरस पीजे ।
पालकि ल्याय, बिठाय दयानिधि,
वाजि मतंग नँगार सजीजे ।
यों करि के गुरु धाम पठावत,
दादु दयालु हिं भक्ति करीजे ॥३९॥
श्री दादूजी ने कहा - डरो मत, तुम जीवों पर दया किया करो, और एक मात्र राम को भजो । बालिंद खान ने उसी दिन से बीच रोजा कुरान किताब सब छोड़ दिये और हरिभक्ति का रस पीने लगा । पालकी मंगाकर दयानिधि दादूजी को बिठाया, हाथी, घोडे नगारों के साथ जुलूस शोभा बढ़ाते हुये उन्हें अपने धाम पहुँचाया । सदैव दादूजी की भक्ति करने लगा ॥३९॥
(क्रमशः)

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