बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

= २९ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दुर्लभ दर्शन साध का, दुर्लभ गुरु उपदेश ।* 
*दुर्लभ करबा कठिन है, दुर्लभ परस अलेख ॥* 
*मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।* 
*शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचै साधु सुजान ॥* 
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साभार : Kripa Shankar B ~ 
असली गुरु दक्षिणा क्या है ??? (What is real Guru Dakshina ???) 
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सनातन धर्म की परम्परा है - गुरु दक्षिणा, जिसमें शिष्य गुरु का उपकार मानते हुए गुरु को स्वर्णमुद्रा, रौप्यमुद्रा(रुपया पैसा), अन्न-वस्त्र और पत्र-पुष्प अर्पित करता है । 
पर यह असली गुरु दक्षिणा नहीं है । ये तो सांसारिक वस्तुएं हैं जो यहीं रह जाती हैं । हालाँकि इस से शिष्य को अनेक लाभ मिलते हैं पर स्थायी लाभ कुछ नहीं मिलता । अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में वास्तविक गुरु-दक्षिणा कुछ और है जिसे वही समझ सकता है जिसका अध्यात्म में तनिक प्रवेश है । 
आपकी सूक्ष्म देह में आपके मस्तक के शीर्ष पर जो सहस्त्रार है, जहां सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है, वह आपकी गुरु-सत्ता है । वह गुरु का स्थान है । उस सहस्त्र दल कमल पर निरंतर गुरु का ध्यान ही असली गुरु-दक्षिणा है । 
गुरु-चरणों में मस्तक एक बार झुक गया तो वह कभी उठना नहीं चाहिए । वह सदा झुका ही रहे । यही मस्तक यानि शीश का दान है । इससे आपके तन, मन, धन और सर्वस्व पर गुरु का अधिकार हो जाता है । तब जो कुछ भी आप करोगे उसमें गुरु आपके साथ सदैव रहते हैं । यही है गुरु चरणों में सम्पूर्ण समर्पण । 
तब आपके अच्छे-बुरे सब कर्म भी गुरु चरणों में अर्पित हो जाते हैं । आप पर कोई संचित कर्म अवशिष्ट नहीं रहता । तब गुरु ही आपकी आध्यात्मिक साधना के कर्ता हो जाते हैं । साधना का सार भी यही है की गुरु को कर्ता बनाओ । दृष्टा, दृश्य और दृष्टी सब कुछ आपके गुरु महाराज ही हैं । आप की उपस्थिति तो वैसे ही है जैसे एक यज्ञ में यजमान की उपस्थिति । आप को तो सिर्फ समभाव में अधिष्ठित होना है । 
अपने गुरु को सहत्रार में सहस्त्रदल कमल पर प्रतिष्ठित कर लो । वे ही आपके कूटस्थ में आसीन होकर समस्त साधना और लोक कार्य करेगे । वे ही फिर आपको सच्चिदानंद से एकाकार कर देंगे । 
यही है सच्ची असली गुरु-दक्षिणा । ॐ श्री गुरवे नमः । ॐ तत्सत् ।

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