卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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जो सरवर को कूद हिलावे,
सर के वासी लख दुख पावे ।
भैंसा है सखि । मैं भल जानी,
सर सत्संग मूर्ख यह प्रानी ॥१५॥
आं. वृ. - “जो सरोवर में कूद कर के उसे हिला देता है और सरोवर के निवासियों को भी व्यथित करता है । बता वह कौन है ?’’
वा. वृ. - “भैंसा है । तालाब में घुसकर उसके जल को हिला डालता है और जल जन्तु भी उसे देखकर भयभीत होते हैं ।’’
आं. वृ. - “नहिं, सखि ! यह तो सत्संग रूप सरोवर है मूर्ख मनुष्य सत्संग में जाकर व्यर्थ की बातें प्रारंभ करता है । उनसे सत्संग में भंग पड़ता है और सत्संगियों को भी व्यथा होती है । तू ऐसा कभी नहीं करना । सत्संग में तो चुपचाप मूर्ति के समान बैठ संतों के वचनामृत का पान करना चाहिये ।’’
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जिसका है उस पासहि जाता,
भूल कभी न अन्य पै आता ।
मैं समझी गो वत्स सयानी,
नहिं, सखि । कर्म कहत विज्ञानी ॥१६॥
आं. वृ. - “जिसका है उसी के पास जाता है, अन्य के पास नहीं जाता । बता वह कौन है ?’’
वा. वृ. - “गाय का बच्छा है । वह हजारों गोओं के झुंड में खड़ी रहने पर भी अपनी मां के पास ही जाता है ।’’
आं. वृ. - “नहिं, सखि ! यह तो पूर्व कर्म का फल है । जिसका कर्म है उसी को भोग देता है । प्रानी अपने ही कर्म से सुखी दु:खी होता है । अन्य कोई भी सुख दुख का दाता नहीं है । तू कभी भी अपने सुख दु:ख का हेतु अन्य को न मानना । अन्य तो निमित्त माष ही होते हैं । ऐसे विचार के स्थिर रहने से तेरा मन सम रह कर प्रभू में लगेगा ।’’
(क्रमशः)

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