रविवार, 27 अक्टूबर 2013

= ३७ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
घरी घरी घटत छीजत जात छिन - छिन, 
भीजत ही गल जात माटी को सो ढ़ेल है । 
मुकति के द्वारे आइ सावधान क्यूँ न होइ, 
बार - बार चढ़त न त्रिया को सो तेल है ॥ 
करले सुकृत हरि भजले अखण्ड नर, 
याही में अन्तर परे या में ब्रह्ममेल है । 
मानुष जनम यह जीत भावे हार अब, 
‘सुन्दर’ कहत या में जुआ को सो खेल है ॥ 

सनातन धर्म एक ही धर्म ~ 
यह मनुष्य इच्छाओं का पहाड़ लिए हुए जीता है । इसलिए दुःख के दलदल में फंसा रहता है, इस दलदल से वह जितना निकलने की चेष्टा करता है उतना ही उसमें धंसता चला जाता है, इसकी असंख्य कामनाओं में तीन प्रमुख है ।
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१. पुत्रैष्णा (पुत्र प्राप्ति की इच्छा) प्रकारांतर से कामेष्णा, भोगैष्णा ।
२. वित्तैष्णा (धनवान होने की इच्छा) लौकिक एवं अलौकिक संपत्ति ।
३. लोकैष्णा (यश प्राप्ति की इच्छा) स्तुति की इच्छा ।
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पुत्रैष्णा की पूर्ति के लिए पुरुष कामिनी के पीछे दौड़ता है, तथा स्त्री कुमार के पीछे भागती है ।
वित्तैष्णा वाले स्त्री पुरुष स्वर्ण, धन के चक्कर में रत दिन एक किये रहते हैं ।
लोकैष्णा इतनी प्रबल होती है कि लोग जीवन पर्यंत अपनी कीर्ति के विस्तार में लगे रहते हैं ।
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कंचन, कामिनी और कीर्ति ये जीवन के तीन ककार हैं । इन तीनों में कृष्ण(कर्षण बल) है । कृष्ण नाम परमात्मा का । यह शरीरधारी जीव अपनी काया को कंचन, कामिनी, और कीर्ति में सदा डुबोये रहता है । इन ककारों में शयन करते करते यह जीव शव हो जाता है ।
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कमातुरता, कामोन्माद से जो सुख व पीड़ा होती है उसे कामज्वर कहते हैं । कामज्वर वैष्णव ज्वर है । यह सृष्टि के कण कण में है, चराचर जगत इससे ओतप्रोत है । जितने भी भाव है सबके मूल में एकमात्र काम ही है । काम में कठोरता कोमलता दोनों हैं ।
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व्यास जी कहते है "कमत्क्रोधोअभिजायते" कम से क्रोध पैदा होता है । क्रोध कठोर भाव हैं और अनर्थ का मूल है । काम से प्रेम की उत्पत्ति होती है । प्रेम कोमल भाव है, यह समस्त अर्थ(शुभ) का हेतु(कारन) है । अब इन तथ्यों पर सोदाहरण द्रष्टिपात करता हूँ ।
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राक्षसराज रावण की बहन सूर्पणखा ने राम को वन में विचरते देखा तो उनके रूप पर आकर्षित हुई और उसने प्रणय के लिए राम से निवेदन किया उसकी इच्छा नहीं पूरी हुई उलटे अनुज लक्ष्मण ने उसके नाक, कान, और स्तनाग्र काट लिए सूर्पणखा क्रोधित हुई और उसने अपने भाई रावण को सीता हरण के लिए प्रेरित किया आगे जो हुआ वह सर्व विदित है ।
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कामासक्त दुर्योधन द्रोपदी को नंगा कर अपनी जांध पर बैठना चाहता था । कृष्ण ने उनके शील की रक्षा की । कामपूर्ति में व्यवधान के फल स्वरुप दुर्योधन क्रोध आदि क्रूर भावों का जन्म हुआ और उसने संधि प्रस्ताव न मानकर युद्ध का निर्णय लिया महाभारत का युद्ध इसी काम का फल है ।
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देव ऋषि नारद को कामव्याल ने डसा उन्होंने भगवन विष्णु से उनका रूप माँगा भगवान् ने उन्हें कुरूप कर दिया इससे नारद को अभीष्ट सुंदरी नहीं मिली और उन्होंने क्रोध कर के विष्णु को श्राप दिया स्त्री के वियोग में रोने के लिए ।
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इन उदाहरणों से स्पष्ट है की काम से क्रोध जन्मता है । क्रोध झगडे की जड़ है, इर्ष्या द्वेष का जनक है, हिंसा का कारक है उत्पात का कारण है और विनाश का घर है, लोभ मोह की खान है । जहाँ क्रोध है वहां ये सब अनर्थकारी भाव होते हैं । यह क्रोध काम की प्रतिक्रिया का परिणाम है । इतिहास साक्षी है सभी लड़ाइयाँ काम के कारण हुई ।
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काम का दूसरा पक्ष प्रेम मूलक है, जहाँ प्रेम है वहां त्याग है, जहाँ त्याग है वहां भक्ति है, जहाँ भक्ति है वहां ज्ञान है, एश्वर्य है शांति है । काम यहाँ वहां सब जगह है । इस काम ने महापुरुषों के द्वारा समाज को उपक्रत भी किया है । कुछ उदाहरण ~ 
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संत तुलसीदास पहले स्त्री देह में आसक्त थे, स्त्री ने उन्हें इसके लिए फटकारा । फलतः उनके काम का उदात्तीकरण हुआ और वे राम भक्त बने । श्री राम चरित मानस करती इसकी साक्षी है ।
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श्री बाल्मिक जी स्त्री परिवार में आसक्त रहकर हिंसा से धन जुटाते थे संतदर्शन से उनमें परिवर्तन आया उनके भीतर के काम ने काव्य का रूप धारण किया फलतः रामायण नमक ग्रन्थ अस्तित्व में आया ।
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व्यास जी कामी थे उनका काम इतिहास, पूराण के श्लोकों में स्पष्ट झलकता है । काम का उत्कृष्ट रूप उनका सारा काव्य है ।
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सुन्दरता से सोया हुआ काम जगता है । सौंदर्य और काम का अनन्य सम्बन्ध है । काम में प्रेम, प्रेम में श्रृंगार, करुणा, वत्सलता, राग, विराग, होता है । राग लौकिक प्रेम तथा विराग अलौकिक प्रेम में पाया जाता है । अलौकिक प्रेम का नाम भक्ति है । बिना विराग के भक्ति नहीं ।
काम में बल होता है उत्साह होता है । क्रोध में उत्साह होता है । प्रेम में भी उत्साह होता है । दोनों भावों में युद्ध होता है । क्रोध में एक दुसरे को मारने व पराजित करने की तत्परता होती है । प्रेम में एक दुसरे से हरने व समर्पण की ललक होती है । क्रोध में मुष्टि प्रहार तथा शस्त्रास्त्र का प्रयोग होता है तो प्रेम में चुम्बन, आलिंगन मर्दन मार्जन होता है । क्रोध का अंत दुःख में होता है तो प्रेम का अंत सुख व आनंद में होता है । क्रोधी जीतने में सुख मानता है तो प्रेमी हारने में सुख की अनुभूति करता है । काम की ये दो धाराएँ अनादि एवं अनंत हैं ।
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काम दोधारी तलवार है । काम की पूर्ती होने से नयी समस्या का जन्म होता है । पत्नी मिल गयी । उसके लिए घर बनाओ, वस्त्र आभूषण जुटाओ, आमोद प्रमोद के साधन लाओ । बच्चे पैदा करो । आवश्यकतायें बढती जाती हैं, समस्याएं नए नए रूप लेती रहती हैं, हाय हाय मची रहती है । सबकी यही दशा है । सब रोते हैं राम की जिस पर कृपा है वही हँसता है । जय श्री राम ।
स्त्री पुरुष के अंग अंग में काम विद्यमान है । यह काम कभी क्रोध के रूप में भयभीत करता है । कभी प्रेम के रूप में प्रसन्नता देता है । यह काम अनिर्वाच्य(जिसका वर्णन न किया जा सके) है ।
जय महाकाल ।

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