#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ४४-४५)*
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**श्री दादू जी को हिन्दु मुसलमान सभी पूजने लगे**
जा दिन दोष स्वभाव मिट्यो पुर,
बेर गये सबही मिल पूजे ।
दादु दयालु खुदाइ धर्यो तन,
ईश्वर रूप धरे तन दूजे ।
हिन्दु रु तुर्क उभै पक्ष पूजत,
प्रश्न रु उत्तर दें जन बूझे ।
या विधि वर्ष गये गुरु देखत,
दादु दयालु सबै पुर पूजे ॥४४॥
तत्पश्चात् साँभर नगर में सभी का दोष स्वभाव मिट गया । सभी वर्ण जाति मिलकर उन्हें पूजने लगे । हिन्दू तुर्क उभय पक्षों द्वारा सम्पूजित दादूजी उनकी प्रश्न - शंकाओं का उत्तर देते रहते । तुर्क उन्हें खुदा का रूप मानते, हिन्दू ईश्वर का अवतार । इस तरह सानन्द समय वर्ष बीतते गये ॥४४॥
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**षट्पदी-गीता परवान**
अपनी भक्ति अखंड, कृष्ण गीता मधि गाई ।
अर्जुन को उपदेश, देय संग्राम जिताई ॥
हरि जन के आधीन, संग दादू दिन राति ।
परचा देय प्रसिद्ध. नगर साँभर विख्याति ॥
पंथ अनादि आप थपि,
साखी शब्द कविता छपय ।
दादू दीन दयालु जन,
परचा देय साँभर दिपय ॥४५॥
जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने गीता उपदेश द्वारा अर्जुन को अखंड भक्ति प्रदान की, उसे संग्राम विजय दिलाई, उसी प्रकार श्री दादूजी ने साँभर शहर में उपदेश ओर परचा देकर दुष्टों की बुद्धि सुधारी, अधर्म पर विजय पाई । अपने अनादि पंथ ब्रह्म सिद्धान्त की स्थापना की । साखी, शब्द रूप में अनुभववाणी की रचना की, और साँभर में देदीप्यमान हुये ॥४५॥
(क्रमशः)

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