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साभार ~ *"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/१३८*
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*दादू आप सवारथ सब सगे, प्राप्त सनेही नांहि।*
*प्राण सनेही राम है, कै साधू कलि मांहि ॥१३८॥*
दृष्टांत -
दुखित देखि इक बणिक सुत, संत दियो उपदेश ।
रोग कटोरे बाहिकर, विरक्त किया विशेष ॥३५॥
एक सेठ का पुत्र कमाऊ था । सब कुटुम्ब उसका बहुत आदर करता था । कर्म की कुटिल गति से उसके शरीर में भयंगर कोढ़ का रोग हो गया । कुटुम्ब ने इलाज कराने का बहुत प्रयत्न किया । किन्तु जब ठीक नहीं होता दीखा तब उपेक्षा करने लगे ।
एक दिन एक संत भिक्षा के लिये आये थे । उन्होंने उसकी हालत देखी तो उनको दया आ गई । उससे वार्तालाप करने से ज्ञात हुआ कि पहले तो कुटुम्बी मेरी सेवा करते थे किन्तु अब तो पानी देना भी उनको कठिन पड़ता है । संत ने कहा - ये सब तो स्वार्थी हैं । अब तुम से इनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होता, इससे उपेक्षा करते हैं । फिर संत ने उसका भविष्य ध्यान द्वारा देखा तो ज्ञात हुआ अब तो इसका रोग शीघ्र ही मिटने वाला है ।
इससे संत ने कहा - तुम अच्छे होकर भगवद् भजन करो तो तुम को भगवान् अच्छा कर देंगे । युवक ने कहा - अच्छा होने पर तो मैं कुटुम्ब को छोड़कर भगवद् भजन ही करुंगा । तब संत ने सब परिवार को बुलाकर कहा - मैं इसके रोग को दूर करने का उपाय करता हूं, आधा सेर दूध ले आलो । लाने पर कहा - मैं मंत्र के द्वारा इसका रोग इस दूध के कटोरे में डालता हूँ । जो इस कटोरे के दूध को पान करेगा उसके इसका रोग लग जायेगा और यह निरोग हो जायेगा ।
यह सुनकर माता, पिता, पत्नि, भाई आदि सब नट गये । अन्त में संत ने कहा - मैं पी लूं । तब तो सबने एक स्वर से कहा - हां, आप तो परोपकारी संत हैं अवश्य पी लें । संत ने पी लिया फिर कु़छ ही दिन में वह युवक निरोग होकर भजन करने चला गया । उक्त कथा से ज्ञात होता है सब स्वार्थ से ही स्नेह करते है । परमार्थ से तो प्रेम परमात्मा और संत ही करते हैं ।
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*दादू कच्छप राखे दृष्टि में, कूंजों के मन मांहि ।*
*सद्गुरु राखे आपणा, दूजा कोई नांहि ॥१४४॥*
समान वचन -
कुरीं सुरति मात्रेण, पक्ष मात्रेणा कुक्कटी ।
कच्छपी दृष्टि मात्रेण, स्नेह मात्रेण साधवः ॥
दृष्टांत -
गुरु शिष के लक्षण कहे, भेज्यो आधी रात ।
बरज्यो वेश्या जावते, आय कहा सु प्रभात ॥३६॥
एक गुरु और एक शिष्य वन में रहा करते थे । शिष्य ने एक दिन पू़छा - गुरु और शिष्य के क्या लक्षण है ? गुरु ने कहा - कभी बतायेंगे । उक्त प्रकार कई बार पू़छा तह एक दिन गुरुजी ने वन से ग्राम में होते हुये ग्राम से आगे एक नदी थी उस पर जाकर स्नान किया और कौपीन तथा कटि वस्त्र वहीं ही सुखा कर आश्रम पर आ गये ।
आधी रात को गुरु ने शिष्य को कहा - मेरा कटि वस्त्र और कौपीन नदी पर रह गये हैं । तुम अभी जाकर ले आओ । आज मंद - मंद वर्षा बरस रही थी । रात भी अंधेरी थी । वन में सिंह आदि भी थे । फिर भी गुरुजी की आज्ञा से शिष्य चल दिया । कौपीन और कटि वस्त्र लेकर ग्राम में आया तो सुना आज अमुक वेश्या का नृत्य हो रहा है । शिष्य भी वेश्या का नृत्य देखने के लिए नृत्य स्थान की ओर चला तो आवाज आई । कहां जा रहा है ? शिष्य ने सोचा आवाज तो गुरुजी की है किन्तु गुरुजी यहां नहीं है ? मुझे भ्रम हो गया है ।
फिर चला तो मुख पर एक थप्पड़ पड़ी । तब वह पीछे लौटकर अपने मार्ग से आश्रम में आ गया । दूसरे दिन शिष्य ने फिर पू़छा - गुरुजी गुरु शिष्य के लक्षण कहो ? गुरु - कह तो दिये । शिष्य - कब !
गुरु - रात्रि को तू मेरी आज्ञान मानकर वर्षा में भी भयंकर वन से जाकर मेरे वस्त्र लाया । यह गुरु आज्ञा मानना ही शिष्य की लक्षण है । तू वेश्या के पास जाने लगा तो मैंने तुझे आवाज देकर रोका, फिर भी जाने लगा तो थप्पड़ मार कर रोका । यही गुरु का लक्षण है । शिष्य आज्ञा में रहे और गुरु शिष्य को अनर्थ से बचावे । तब शिष्य ने कहा - अब मैं समझ गया । इस कथा से ज्ञात होता हे कि गुरुजन स्नेह पूर्वक शिष्यों को अनर्थ से बचाते रहते हैं ।

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