बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

= २८ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*करै करावै सांइयॉं, जिन दिया औजूद ।* 
*दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥* 
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साभार : साधना, शरणागति और कृपा ~ 
श्री हनुमान जी जब लंका दहन के पश्चात लौटकर आए तो प्रभु श्री राम ने उनसे कहा, ‘‘लंका में तो तुमने बड़े महान कार्य किए।’’ इस पर हनुमान जी प्रभु के चरणों को पकड़ कर बोले, ‘‘लंका तो आपने मुझे बहुत बड़ी शिक्षा लेने के लिए भेजा था।’’ 

‘‘देने के लिए या लेने के लिए?’’ हनुमान जी ने कहा, ‘‘महाराज, मैं क्या शिक्षा देता? मैं तो लंका से शिक्षा लेकर आया हूं।’’ शिक्षा लेकर आए हो? बोले, ‘‘प्रभो! जब मैंने इतने बड़े समुद्र को पार कर लिया, तो सोचा कि सीता जी को भी ढूंढ लूंगा, पर ढूंढ नहीं सका। तो इसके द्वारा आपने स्पष्ट बता दिया कि भक्ति तो कृपा के द्वारा ही पाई जाती है और उसके द्वारा पा लिया तो स्पष्ट ही है कि मेरे पुरुषार्थ का कोई अर्थ नहीं।’’ 

‘‘प्रभो ! इतना ही नहीं, दूसरा पाठ तब मिला, जब अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी व्याकुल हो गईं और शरीर त्याग करने तक के लिए व्याकुल हो गईं। उनकी व्याकुलता को देखकर त्रिजटा नाम की राक्षसी बोली कि आज रात मैंने सपने में देखा कि एक वानर लंका में आया हुआ है।’’ 

‘‘प्रभो यह सुनकर मैं लज्जा के मारे गड़ गया। मैं सोचता था कि भला लंका में संत कहां हैं? पर वहां तो मुझे ऐसे-ऐसे संत मिले, जैसे संसार में अन्यत्र नहीं मिले। उसने स्वप्न में भी सत्य देख लिया और उस राक्षसी ने जब कहा कि वह आया हुआ वानर लंका को जलाएगा, तब तो मैं चकित रह गया परन्तु बाद में जब वह बात सत्य सिद्ध हुई, तब मैंने कहा कि त्रिजटा इतनी महान भक्त है कि जो बात आप ने मुझसे नहीं कही, वह त्रिजटा से कह दी। मुझसे तो आप ने बिल्कुल नहीं कहा था कि लंका को जलाना है, पर आपने त्रिजटा से संदेश भिजवाया।’’ 

त्रिजटा ने कहा : 
सपनें बानर लंका जारी,
जातुधान सेना सब मारी॥ 
‘‘तो प्रभु, मेरा यह भ्रम दूर हो गया कि किसी देश विशेष में संत होते हैं, किसी जाति में ही संत होते हैं। हमें लगने लगा कि आप सर्वव्यापी हैं तो आपके संत भी सर्वत्र हैं। कितना बड़ा चमत्कार, त्रिजटा कोई साधारण नहीं थी। भगवान राम के चरणों में उसकी महानतम रति है : 
त्रिजटा राम राच्छसी एका। 
राम चरन रति निपुन बिबेका॥ 
‘‘वह रति ऐसी है, जिसकी याचना करते हुए भरत जी कहते हैं - मुझे न धन की इच्छा है, न धर्म की, न काम की और न मोक्ष की। मैं तो बस यही वरदान मांगता हूं कि जन्म-जन्म में मेरा श्रीराम के चरणों में प्रेम बना रहे।’’ 
अरथ न धरम न काम रुचि, 
गति न चहउं निरबान। 
जनम-जनम रति राम पद, 
यह बरदान न आन॥ 
‘‘त्रिजटा लंका में रहकर भी उस रति की स्थिति में पहुंची हुई है, उसकी कितनी सर्वव्यापिनी दृष्टि है। रावण की मृत्यु क्यों नहीं हो रही है, इसका भी रहस्य बताने वाली त्रिजटा ही है।’’ 
‘‘प्रभो ! इससे भी बढ़कर तीसरा पाठ मुझे तब मिला कि जब रावण वार्तालाप करते हुए सीता जी का सिर काटने के लिए तलवार निकाल उनकी ओर दौड़ा। मेरे सामने एकमात्र उपाय था कि मैं वृक्ष से कूद रावण की तलवार छीन उसका सिर काट देता, लेकिन मेरे कूदने से पहले ही जब मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, तो मेरी आंखों में आंसू आ गए कि प्रभो, आप तो शत्रु की पत्नी से भी काम ले लेते हैं। मैं समझ गया कि मैं व्यर्थ ही भ्रम पाले बैठा था कि मैं आपका काम करने लंका आया हुआ हूं।’’ 

‘‘पहला काम तो विभीषण जी ने कर दिया, दूसरा मंदोदरी ने, तीसरा त्रिजटा ने किया और अंत में तो प्रभो, पराकाष्ठा हो गई, त्रिजटा ने कहा था कि वानर लंका जलाएगा अब न तो मेरे पास आज्ञा थी और न ऐसी कोई योजना थी, पर रावण ने जब विभीषण की बात मानकर मृत्युदंड रोक दिया और उसके बाद कहा कि मृत्यु तो नहीं पर दंड तो अवश्य दिया जाएगा। इसकी पूंछ में कपड़ा लपेट घी-तेल डाल आग लगा दी जाए, तो प्रभो यह सुनकर तो मैं बिल्कुल भाव में ही डूब गया क्योंकि पहले मैंने सोचा था कि आप रावण की पत्नी से काम करा लेते हैं।’’ 

‘‘जब मेरे मृत्युदंड का विरोध विभीषण ने किया, तो मैंने सोचा कि आप ने रावण के छोटे भाई से भी काम ले लिया किन्तु जब स्वयं रावण ने कहा कि पूंछ में कपड़ा लपेट घी-तेल डालकर जला दो तो मैंने सोचा वाह प्रभो, आप तो रावण से भी अपना काम करा लेते हैं। अब लंका जलाने के लिए घी, तेल और कपड़ा कहां से लाता? लेकिन सारा प्रबंध आपने रावण से ही करा दिया। जो कुछ हुआ, वह क्या मैंने किया?’’

प्रभु बोले,‘‘तो तुमने लंका को जला दिया है?’’ 
हनुमान जी बोले,‘‘प्रभो, केवल लंका थोड़े ही जली है, अन्य भी अनेक काम हुए हैं।’’ 
‘‘अच्छा और क्या-क्या काम कर डाले?’’ प्रभु बोले। 
‘‘समुद्र लंघन किया, लंका को जलाया, राक्षसों को मारा और बगीचे को उजाड़ डाला।’’ 
‘‘अरे, तुमने तो चार-चार काम कर डाले?’’ प्रभु ने कहा। 
हनुमान जी बोले नहीं, ‘‘मैंने कुछ भी नहीं किया, सब कुछ आपकी ही कृपा से हुआ।’’ 
नाघिं सिंधु हाटक पुर जारा। 
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥ 
सो सब तब प्रताप, रघुराई। 
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

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