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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/१०७*
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दादू शिष्य भरोसे आपणे, हो बोलो हुसियार ।
कहेगा सो बहेगा, हम पहले करैं पुकार ॥१०७॥
प्रसंग कथा व दृष्टांत -
दो गुरु शिष्य रु नृपति को पुनः गुसाई जान ।
तीजा जग्गा का सुना, सूत हि पूत बखान ॥२७॥
उक्त १०७ की साखी दादूजी ने जग्गाजी को कही थी ।
प्रसंग- जग्गाजी आमेर में भिक्षा लाने जाया करते थे । उनके कटि के बांधने का सूत का आडबन्ध जीर्ण हो गया था । इससे दूसरा बनाना चाहते थे । एक दिन भिक्षा लाने गये तब होनहार के कारण कु़छ विचार तो रहा नहीं । इससे बोलने लगे - दे माई सूत, ले माई पूत ।
एक खन्डेलवाल वैश्य परिवार की बाई जिस का नाम शांति था । वह जग्गा जी का वचन सुन कर अपने घर में काते हुये सुत की कूंकडियों की एक अंजलि पूरी भर कर ले आई और बोली - लो बाबाजी सूत्। दो बाबाजी पूत जग्गाजी ने सूत ले लिया और उसे पुत्र होने का वर दे दिया ।
दादूजी ने अपनी योग शक्ति से उक्त वृत्तान्त उसी क्षण जान लिया । जग्गाजी भिक्षा की झोली टोलाजी को देकर प्रतिदिन दादूजी को प्रणाम करने जाते थे । आज साष्टांग दंडवत प्रणाम करके ज्यों ही हाथ जोड़कर सामने खड़े हुये तब दादूजी ने उक्त १०७ की साखी सुनाई और कहा - आपको अपने भरोसे पर सचेत होकर ही वरदान देना चाहिये । आज आपने सूत के बदले पूत दिया है, उसके प्रारब्ध में तो पुत्र है ही नहीं । अब उसके पुत्र नहीं होगा तो संतों का अपवाद होगा कि संत भी मिथ्या बोलते हैं । अतः अब आप ही उके पुत्र रुप में जन्म लें ।
जग्गाजी - मैं अवश्य उसका पुत्र बनूंगा किन्तु इच्छानुसार आपका सत्संग करके फिर शरीर त्याग कर उसके गर्भ मे जाऊंगा फिर भी आप के चरणों में आना चाहता हूँ । इतनी कृपा आप अवश्य करें । यही मेरी हार्दिक प्रार्थना है । दादूजी ने कहा तथास्तु । दूसरे जन्म में जग्गाजी छोटे सुन्दरदासजी बने । उक्त कथा साखी के प्रसंग की भी है और पुत्र बनना पड़ा यह दृष्टांत भी इस कथा में है ।
द्वितीय दृष्टांत- दो गुरु शिष्य रु नृपति को - एक गुरु और एक शिष्य अपने आश्रम में रहते हुये भजन करते थे । उस प्रदेश के राजा के पुत्र नहीं था । वह पुत्र प्राप्ति के लिये उक्त संत के आ रहे थे । संतजी को अपनी योग शक्ति से राजा की कामना का पता लग गया । उससे राजा के आश्रम पर पहुंचने से पहले ही भ्रमण करने निकल गये ।
राजा ने आकर शिष्य से पू़छा- गुरुजी कहां गये हैं ? शिष्य- गुरुजी से क्या काम है ? कहो वह मैं ही कर दूंगा । राजा- पुत्र नहीं है । अतः पुत्र प्राप्ति का वर लेने आया था । शिष्य- जाओ तुम्हारे पुत्र हो जायेगा । राजा भेंट चढ़ा कर प्रसन्न मन लौट गया । गुरुजी आये और आश्रम में घोड़े के खोज देखकर पू़छा- कौन आया था ? शिष्य- राजा । गुरु - क्यों आया था ? शिष्य - पुत्र के लिये । गुरु- फिर । शिष्य- मैंने पुत्र होने का वर दे दिया । गुरु - उसके प्रारब्ध में पुत्र है ही नहीं । जब पुत्र नहीं होगा तो संतों की निन्दा होगी । अतः तुम ही शरीर छोड़कर उसके पुत्र बनो ।
शिष्य शरीर छोड़कर राजा के पुत्र रुप में जन्मा । पांच वर्ष की अवस्था तक बोला नहीं । बुलाने के सभी प्रयास किये किन्तु कोई भी सफल नहीं हुआ । एक दिन उसे वन को दिखाने वन में ले गये । एक तीतर बोला उस की आवाज पर साथ के शिकारी ने उसे गोली मारी वह मर गया । अब लड़का बोला - बोला और मारा । तब साथ वालों ने राजा को कहा - आज राजकुमार बोल गये हैं । राजा ने कहा - अब बुलाओ - किन्तु वह नहीं बोला । तब राजा ने उन लोगों को कहा - तुमने मिथ्या बोला है । अतः तुम को फांसी दी जायगी ।
तब लड़के ने देखा नहीं बोलने से इन को फांसी होगी । लड़का बोला - बोलने से तो मृत्यु मिलती है । वन में तोतर बोला और मारा गया । मैं भी आपको पुत्र देने को बोला तो मुझे भी मरकर के तुम्हारा पुत्र होना पड़ा । मैंने मेरा वचन सत्य कर दिया अब अपने गुरुजी के पास जाता हूँ । तुम भी भगवत् भजन करो । यह कहकर लड़का गुरुजी के पास पहुँच गया ।
तृतिय दृष्टांत - पुनः गुसांई जान - एक गुसांई एक भक्त के दरवाजे में रह रहे थे । भक्त उनकी सेवा भी अति प्रेम से करता था । भक्त के पुत्र नहीं था । अतः उसने गुसांईजी से प्रार्थना की तब गुसांईजी ने वर दे दिया तेरे पुत्र हो जायेगा । फिर वहां ही शरीर छोड़कर उसके पुत्र बने । उनकी पुस्तकें वहॉं ही पड़ी थीं ।
जब बालक दो वर्ष का हुआ तो उन पुस्तकों की उतारने का आग्रह किया । उतारने पर पुस्तक खोलकर पुस्तक पढ़ने लगा । तब सब घर वालों ने आश्चर्य किया । फिर एक संत ने कहा - यह पुत्र ही पहले गुसांई था । अतः पुस्तकों के संस्कार इसमें है । इससे सूचित होता है कि जब बिना विचारे ही पुत्र होने का वर दिया जाता है तो वरदाता को ही पुत्र होना पड़ता है । उक्त तीनों कथायें यही बताती हैं ।

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