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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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एक लखत सत्वर खिल जाई,
दूसर देखत ही मुरझाई ।
है यह कंज सखी मैं जाना,
मुख है सखि ! नहिं भल पहचाना ॥५॥
आं. वृ. - ‘‘एक को देखकर तुरंत खिल जाता है और दूसरे को देखते ही मुच जाता है। बता वह कौन है?’’
वा. वृ - ‘‘कमल है। सूर्यमुखी सूर्य को देखकर खिलता है और राषि को मुच जाता है। वैसे ही चन्द्रमुखी चन्द्रमा से खिलता है दिन को मुच जाता है।
आं वृ. - ‘‘नहीं सखि ! यह तो मुख है। अनुकूल को देखकर खिलता है, प्रतिकूल से मुरझा जाता है। यह भेद भाव आत्म साक्षात्कार बिना दूर नहीं होता। अत: तुझे ब्रह्म साक्षात्कार का साधन भगवत् भक्ति अवश्य करनी चाहिये।’’
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कूदत फूलत पर बल जोऊ,
मुख लागत खोटा अति सोऊ ।
भाड़ चणा जाना मैं प्यारी,
नौकर सखि ! नहीं ठीक उचारी ॥६॥
आं. वृ. - ‘‘जो दूसरे के बल से कूदता, फूलता है और मुंह लगने पर हानिकारक सिद्ध होता है। बता वह क्या है?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो भाड़ में सिकता हुआ चणा है। अग्नि से कूदता-फूलता है। खाने से रुचि नहीं भरती और अधिक खाने पर हानि करता है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! वह तो नौकर है। स्वामी के बल पर कूदता-फूलता है और विशेष मुँह लगाने पर हानिकारक सिद्ध होता है। तू अपने नौकरों से मर्यादा सहित ही भाषण किया कर। आवश्यकता बिना नौकरों से बातें करने पर वे कार्यों में प्रमाद करने लगते हैं।
(क्रमशः)

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