卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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इक के वश में सब नर नारी,
वटु यति तपी गृही आचारी ।
है यह भूप सखी मैं जानी,
नहिं अति पापी उदर सयानी ॥११॥
आं. वृ. - ‘‘ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थ, संन्यासी और आचार्य आदि सभी नर नारी एक के वश में हो रहे हैं। बता वह कौन है?’’
वा. वृ. - ‘‘राजा है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं सखि! यह तो पाप कराने वाला महापापी पेट है। तू भी सावधान रहना, कहीं पेट के अधीन होकर पाप कार्य में नहीं पड़ जाना।’’
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निज घर भूल सखी भटकाता,
नहिं समझत सज्जन समझाता ।
है यह बाल अबोध सयानी, नहिं, सखि ।
कुल पालक अज्ञानी ॥१२॥
आं. वृ. - ‘‘अपने घर को भूल कर इधर उधर भटकता और सज्जनों के समझाने पर भी नहीं समझता। बता यह कौन है?’’
वा. वृ. - ‘‘अबोध बालक है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहिं सखि! यह तो अपने सभी कुटुम्ब का पालन करने वाला अज्ञानी मनुष्य है। अपने अनादि स्थान परमात्मा के स्वरूप को भूलकर संसार में इधर उधर भटक रहा है। तू भी बहुत भटकती रही है, अब तो निरंतर भगवत स्वरूप में मन लगाना जिससे भव में भटकना रुक जाय।’’
(क्रमशः)

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