गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

= च. त./२४-२५ =

#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” २४-२५)* 
**काजी जी का प्रसंग** 
भक्ति सुनी खलहू जर जावत, 
काजिन आप गयो अजमेरी । 
स्वामि जु नामहिं तें दुख पावत, 
बेग हि दुर्गहु तांहि निबेरी । 
हाथ कतेब लई अरु खीजत, 
काफिर आय रहा इत फेरी । 
बांचि कुरान जु भिस्त हि पावत, 
राम कहे शठ काफिर केरी ॥२४॥ 
श्री दादूजी की भक्ति का प्रभाव देखकर साँभर का काजी बहुत दु:खी हुआ । वह खल ईर्ष्या द्वेष से जलने लगा । उसने अजमेर में बड़े काजी को साँभर बुलाया । उन्होंने खास - खास मुल्लाओं के साथ दुर्ग में बैठकर मंत्रणा की । दादूजी की निन्दा करने लगे कि - यह काफिर कहाँ से आकर यहाँ फेरी लगाने लगा है । काजी, हाथ में कुरान की किताब लेकर मुल्लाओं से कहने लगा - जो कुरान पढ़ेगा वही भिस्त(स्वर्ग) को पावेगा । और जो शठ, राम कहेगा वह काफिर दोजख(नरक) में जावेगा ॥२४॥ 
**श्री दादूजी कुरान भी पढ़े हुये थे** 
है यहु काफिर ढेर कियो पुर, 
स्वामि कहें - सुन मूरख काजी । 
क्रोध करे, घट फूल रह्यो शठ, 
भूल गयो इन देखत बाजी । 
बोलत काफिर, ना दिल साबत, 
काफिर ताहिं कहै शठ पाजी । 
मूवा न खावत, जीव न मारत, 
मुसलमान हु धर्म है काजी ॥२५॥ 
उसे दादू - नाम मात्र से पीड़ा होने लगी । क्रोध और मद में अन्धा होकर काजी दादूजी के पास गया, और कहने लगा - अरे काफिर ! तुने सारे नगर का धर्म ढेर कर दिया । स्वामीजी ने उत्तर दिया - मूर्ख काजी ! तू क्यों क्रोध कर रहा है ? अरे शठ ! तू मद में क्यों फूल रहा है ? सब कुछ राम की बाजी(लीला) देखते हुये भी अपना ईमान धर्म भूल गया । दूसरों को काफिर बोलता है, और खुद का दिल साफ नहीं है । अरे पाजी ! काफिर तो उसे कहते हैं - जिसके दिल में मैल हो, अपने इष्ट से, दीन ईमान से दगा करे । तुम मुसलमान होकर अपना फर्ज नहीं निभाते, कुरान के मुताबिक सच्चा मुसलमान वही है जो जीव - हिंसा न करे, मृतक का मांस न खावे, अल्लाह की राह पर चले, सब जीवों पर दया करे ॥२५॥ 
(क्रमशः)

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