卐 दादूराम~सत्यराम सा 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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द्वितीय दिन ~
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ऊपर कोमल मांहि कठोरा,
प्रथम सुहावन अन्तहि घोरा ।
है यह बेर सखी मैं जानी,
नहिं सहचरी ! दुष्ट यह प्रानी ॥५॥
आं. वृ. - ‘‘जो ऊपर से तो बड़ा कोमल प्रतीत होता है किन्तु भीतर कठोर होता है तथा प्रथम तो अच्छा लगता है परन्तु अन्त में दु:प्रदाता ही सिद्ध होता है । यदि तू जानती है तो बता क्या है ?’’
वा. वृ. - ‘‘सखि ! मैं समझ गई यह तो बेर है, उक्त लक्षण बेर में मिलते हैं ।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि यह तो दुर्जन प्राणी है । ऊपर से मीठी बांतें करता है किन्तु दांव आने पर सर्वनाश तक करने में भी संकोच नहीं करता । ऐसे दुर्जनों से सदा दूर ही रहना चाहिये ।’’
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वा. वृ. - सखि ! तुम्हारी बात सुन, होता हर्ष महान ।
मैं तो रही प्रमाद में, तुम तो ज्ञान निधान ॥६॥
शुभ का फल दे अशुभ अबोधा,
कृत नहिं मानत करत विरोधा ।
क्या समझी सखि ! विपिन करीरा,
नहिं सखि ! यह कृतघ्नी शरीर ॥७॥
आं. वृ. - ‘‘जो शुभ का फल अशुभ देता है और अज्ञानी है । किये हुए उपकार को नहीं मानता, उलटा उपकारक से विरोध करता है । संगिनी ! यदि तू समझी है तो बता यह कौन है ?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो कैर का वृक्ष है । वह मीठा जल पिलाने पर भी कड़वा फल देता है और पास जाने पर कांटे भी चुभाता है ।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं सखि ! यह तो कृतघ्नी प्राणी है । तुझे कृतघ्नियों से दूर ही रहना चाहिए ।’’
(क्रमशः)

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