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卐 सत्यराम सा 卐
ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥टेक॥
मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूंगा, रस माता ॥१॥
अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥२॥
अलख लखूंगा, अकथ कथूंगा, एक मथूंगा, गोविन्दा ॥३॥
अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥४॥
अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥५॥
यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥६॥
आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥७॥
नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥८॥
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साभार ~ @अज्ञात ज्योति
ऐसे मनाएं गुरू पूर्णिमा का त्योहारः
गुरु के पूजन का दिन है - गुरुपूर्णिमा परंतु गुरुपूजा क्या है? गुरु बनने से पहले गुरु के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आये होंगे, अनेक अनुकूलताएं-प्रतिकूलताएं आयी होंगी, उनको सहते हुए भी वे साधना में रत रहे, ‘स्व’ में स्थित रहे, समता में स्थित रहे।
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वैसे ही हम भी उनके संकेतों को पाकर उनके आदर्शों पर चलने का, ईश्वर के रास्ते पर चलने का दृढ़ संकल्प करके तदनुसार आचरण करें तो यही बढ़िया गुरुपूजन होगा। हम भी अपने हृदय में गुरुतत्त्व को प्रकट करने के लिए तत्पर हो जाएं- यही बढ़िया गुरुपूजा होगी।
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जिनके जीवन में सद्गुरु का प्रकाश हुआ है वास्तव में उन्हीं का जीवन जीवन है, बाकी सब तो मर ही रहे हैं। मरनेवाले शरीर को जीवन मानकर मौत की तरफ घसीटे जा रहे हैं। धनभागी तो वह हैं जिनको जीते-जी जीवन मुक्त सद्गुरु मिल गये... जिनको जीवन मुक्त सद्गुरु का सान्निध्य मिल गया, आत्मारामी संतों का संग मिल गया, वे बड़भागी हैं।
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ऐसे शिष्यों के पास चाहे ऐहिक सुख-सुविधाओं के ढेर हों, चाहे अनेकों प्रतिकूलताएं हों फिर भी वह मोक्ष मार्ग में जाते हैं। गुरु और शिष्य के बीच जो दैवी संबंध होता है उसे दुनियादार क्या जानें? सच्चे शिष्य सद्गुरु के चरणों में मिट जाते हैं और सच्चे सद्गुरु निगाहों से ही शिष्य के हृदय में बरस जाते हैं।
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गुरुपूर्णिमा का पर्व गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व है। शिष्य को गुरु से जो ज्ञान मिलता है वह शाश्वत होता है, उसके बदले में वह गुरु को क्या दे सकता है? लेकिन वह कहीं कृतघ्न न हो जाय इसलिए अपने सद्गुरुदेव का मानसिक पूजन करके गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुचरणों में शीश नवाते हुए प्रार्थना करता है:
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‘गुरुदेव ! हम आपको और तो क्या दे सकते हैं। इतनी प्रार्थना अवश्य करते हैं कि आप स्वस्थ और दीर्घजीवी हों। आपका ज्ञानधन बढ़ता रहे, आपका प्रेमधन बढ़ता रहे। हम जैसों का मंगल होता रहे और हम आपके दैवी कार्यों में भागीदार होते रहें।
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