रविवार, 29 दिसंबर 2013

दादू जे साहिब को भावे नहीं ९/२

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*चेतावनी का अंग ९/२*
*दादू जे साहिब को भावे नहीं, सो हम तैं जानि होय ।* 
*सद्गुरु लाजे आपना, साध न माने कोइ ॥२॥* 
दृष्टांत - 
इक बंदे किय तीन सौ, ग्रन्थ राम गुण गाथ । 
परा शब्द ऐसा भया, इनतैं मोहि न पात ॥१॥ 
एक भक्त ने राम गुण गान रूप कथाओं के तीन सौ ग्रन्थों की रचना की थी । अन्त में पराशब्द(ब्रह्मवाणी) उसे सुनाई दी कि इन गाथाओं से मेरी प्राप्ति नहीं होती है । मेरी प्राप्ति तो मेरे में परम प्रेम करने से अथवा अद्वैत निष्ठा से ही होती है । यह उक्त २ की साखी में कहा है - कि जो प्रभु को प्रिय नहीं हो, वह हमसे होना ही नहीं चाहिये ।
(क्रमशः)

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