॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
*दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि ।*
*आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥१७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह काया क्षण - भंगुर और कच्चे घड़े की तरह है । हमें इसका कोई विश्वास नहीं है कि यह स्थिर रहेगी ? और क्या कहैं ? हाथी के ऊपर बैठने वाले, मस्तक के ऊपर छत्रधारी, ऐसे ऐसे चक्र वर्ती राजाओं के भी शरीर एक क्षण में विनष्ट हो गये हैं ॥१७॥
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*दादू काया कारवीं, पड़त न लागै बार ।*
*बोलणहारा महल में, सो भी चालणहार ॥१८॥*
टीका ~ यह पंच भौतिक शरीर, अविद्या रचित कच्चे घड़े की तरह है । इसके नाश होने में कोई देर नहीं लगती है । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि इस काया रूपी महल में बोलने वाला, आभास अन्तःकरण रूप प्राण, यह भी जाने वाला है । इसलिये राम - नाम के स्मरण द्वारा अपनी रक्षा करो ॥१८॥
(क्रमशः)
(क्रमशः)

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