शनिवार, 28 दिसंबर 2013

कछू न कीजे कामना ८/८५

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निष्कामी पतिव्रता का अंग ८/८५*
*कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होइ । * 
*पलट जीवतैं ब्रह्म गति, सब मिल माने मोहि ॥८५॥ * 
दृष्टांत - 
करड़ाले स्वामी रहैं, तहां इक आवत प्रेत । 
पू़छा प्रभु मैं ग्वाल था, बड़ी आयु वर लेत ॥२०॥ 
दादूजी महाराज जब करड़ाले विराजते थे तब एक दिन आरती के समय एक प्रेत ने वहां आकर कुचेष्टांयें करना आरम्भ किया, इससे आरती की लय भंग हो गई । तब दादूजी ने पू़छा - क्या बात है ? क्यों डर रहे हो ? आरती गाने वाले संत तथा भक्तों ने कहा - कोई प्रेत ज्ञात होता है । वह अपनी कुचेष्टाओं से विघ्न डाल रहा है । 
तब दादूजी ने भी उसको देखा और दया पूर्वक उस पर अपने कमण्डल का जल डालकर उसको प्रेत योनि से मुक्त कर दिया । वह सुन्दर मनुष्य बन गया और दादूजी को प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये समाने खड़ा हो गया । दादूजी ने पू़छा - तुम कौन है ? उसने कहा - भगवन् ! मैं पहले इस ग्राम का ग्वाल था । इस पास की पहाड़ी में पशु चराया करता था । 
एक समय इस पहाड़ी पर एक संत आये थे और पहाड़ी की एक शिला पर बैठे हुये भजन ही करते थे । कहीं भी आते जाते नहीं थे । मेरी माँ मुझे दो रोटी देती थी और एक जल का पात्र भर देती थी । उनमें से एक रोटी संतजी को देता था और आधा जल पिला देता था । यह बात मैंने घर वालों को भी नहीं कही थी । 
वे संत चिरकाल तक रह कर जाने लगे तब मुझे बोले - तूने हमारी बहुत सेवा की है अतः जो इच्छा हो वही वर मांग ले । मैंने कहा - मेरी आयु बड़ी हो जाय यही वर दें । संत ने कहा - बड़ी आयु प्रेत की होती है, तू प्रेत होजा । मैंने दुःखी होकर कह - यह तो शाप है । संत - शाप नहीं वर ही है । मैंने पू़छा - कैसे ? संत - प्रेत योनि में तुझे संतप्रवर दादूजी का दर्शन होगा और प्रेत योनि से मुक्त होकर उत्तम लोक को चला जायेगा । तू चिन्ता मत कर । 
यह कहकर संत चले गये और मैं प्रेत होकर यहाँ रहने लगा । आज उन संतजी की वाणी सत्य हो गई । फिर वह दादूजी को प्रणाम करके उत्तम लोक को चला गया । कामना करने से प्रेत हुआ था । इससे उक्त ८५ की साखी में कहा है - "कुछ न कीजे कामना" इतिश्री निष्काम पतिव्रता का अंग ८ समाप्त
(क्रमशः)

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