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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/१३२*
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दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार ।
आपा सुरझे सुरझिया, यह गुरु ज्ञान विचार ॥१३२॥
दृष्टांत -
आम्हां साम्हां उंघ हैं, चोर भरतरी दोय ।
लख्यो भरतरी साधु ही, चोर - चोर ही जोय ॥३३॥
सत भर्तृहरि कीसी वन प्रदेश में रात्रि को भजन कर रहे थे । उनको भूख ने व्यथित कीया । वे प्रातः ही भोजन प्राप्ति के लिए चल दिये । सूर्योदय पर उनको दो चार घर दिखाई दिये । उन घरों में किसान रहते थे । वहां जाने पर एक वृद्ध ने आकर उनको प्रणाम किया । भर्तृहरि ने कहा - भूख लगी है । किसान - भगवन् । रात की रोटी हमारे मिल सकती है किन्तु रात की रोटी आपको नहीं जिमाना चाहते । थोड़ी देर द्वार के भीतर के चबूतरा पर आप विराजें । अभी गर्म रोटी तैयार हो जायगी । द्वार के भीतर के चबूतरे थे बीच में पशु आदि के आने का मार्ग था ।
इतने में एक चोर जो रात्रि भर चोरी के लिए भटका किन्तु उसे कु़छ नहीं मिला । वह भी वहां आ पहुंचा । उसे देखकर वृद्ध किसान ने कहा - भाई ! प्रातः भोजन के समय आये हो थोड़े चबूतरे पर बैठो भोजन करके ही जाना । दूसरे चबूतरे पर चोर बैठ गया ।
चोर की उँघ आती थी उसे देखकर भर्तृहरि ने सोचा - यह भी कोई भजनानंदी संत है रात भर भजन करते थे, इससे ऊंघ आ रही है । चोर ने भी भर्तृहरि को ऊँघते देखकर सोचा - यह भी कोई साधु के भेष में चोर है रात्रि भर चोरी के लिये फिरता रहा है । इससे उसे ऊंघ आ रही है । अतः प्रपंच मे उरझे हुये को उरझा हुआ और सुरझे हुये को सुरंझा हुआ भासता है । व्यक्ति अपने समान ही अन्य को देखता है ।
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सुरझे गुरु का ज्ञान विचारने से सुरझता है इस अर्थ पर दृष्टांत -
एक डून जी साधु पै, छूटू कौन उपाय ।
वृक्ष बाथ उपदेश दे, भूत दिखायो आय ॥३४॥
एक डूम एक संत के सत्संग मे जाता था और सत्संग समाप्ति पर संत से कहता था मुझे कुटुम्ब ने पकड़ रखा है । संत कहते थे तूने कुटुम्ब को पकड़ रखा है । उक्त प्रकार बातें होती ही रहती थी । एक दिन संत प्रातः वन में गये थे । डूम भी अपने पशुओं को लेकर वन में गया था । संत ने उसे देखा और आवाज दी । वह आया और देखा संत एक वृक्ष को बाथ में लिये खड़े हैं ।
संत ने कहा - मुझे इस वृक्ष ने पकड़ लिया है तू छूडा दे । उसने कहा - वृक्ष को तो आपने पकड़ा है । संत - नहीं मुझे वृक्ष ने पकड़ा है, वैसे ही तूने कुटुम्ब को पकड़ा है, तू मुझे कहता है हाथ हटा लो, वैसे ही तू राग हटाकर चला जा । वह चला गया घर पर नहीं आया । कु़छ दिनों बाद लोगों ने सोचा उसे सिंह खा गया है । उसकी स्त्री ने ग्राम से प्रार्थना की - हम ग्राम के सेवक हैं । ग्राम मेरे बच्चों की पोषण करे । ग्राम ने उसके खाने का प्रबन्ध कर दिया ।
दो मास बाद डूम रात को घर जाकर घर के पीछे की ताक से घर में देखा तो उसके बच्चे ने उसका मुख देखकर कहा - बापू बापू । स्त्री बोली क्यों उसे याद करता है । हमको उसके जाने पर पेट भर खाने को मिलने लगा है । यह सुनकर डूम संत की बात सत्य मानकर पीछा ही लौट गया और भगवत् भजन करके सुगति को प्राप्त हुआ । सुरझे गुरु के ज्ञान से उरझा हुआ भी सुरझ जाता है ।
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आपा उरझे उरझिया इस साखी पर तृतीय दृष्टांत स्वामी रामदासजी कहा करते थे । उसका भी दोहा बनाकर यहां दिया जाता है । देखिये -
गंगा तेली भोज ने, कीन्हा मूक विचार ।
नारायण समझे उभय, निजी भाव अनुसार ॥
राजा भोज के समय में उज्जैन नगरी में एक गांगा नामक तेली भी था और अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी भी मानता था । भोज भी उसके अभिमान पूर्णं वचन लोगों से सुनते रहते थे । एक दिन भोज ने सोचा - गांगा के विचारों का पता लगाना ही चाहिये । किन्तु वाणी से तो बात करने योग्य वह नहीं है । अतः उससे मूक शास्त्रार्थ किया जाय, उसी मे उसके विचार ज्ञात हो जायेंगे । राजा ने गांगा को कहलाया, गांगा ने मान लिया ।
फिर राजा ने एक दिन गांगा को अपने सामने बैठाकर गांगा की और एक अंगुली की । उसका तात्पर्य था एक ब्रह्म ही सत्य है । उसे देखकर गांगा ने राजा की ओर दो अंगुली की । उसका तात्पर्य था तुम मेरी एक आँख फोड़ने के लिये एक अंगुली दिखाते हो तो मैं दोनों अंगुलियों से तुम्हारी दोनों आँखे फोड़ दूंगा । राजा ने समझा माया और ब्रह्म दोनों ही अनादि होने से सत्य हैं ।
फिर राजा ने गांगा की और तीन अंगुलियां की । तात्पर्य था की माया तो त्रिगुणात्मिका है - माया, विक्षेपशिक्ति, अविद्या । गांगा ने समझा राजा मेरे मुख पर तीन अंगुलियां मारने की कहता है । अतः गांगा ने राजा की ओर चार अंगुलियां की । उसका तात्पर्य था - तुम मेरे मुख पर तीन अंगुलियां मारोगे तो मैं चार अंगुलियाँ तुम्हारे मुख पर मारुँगा । राजा ने चार अंगुलियाँ देखकर समझा कि गांगा कहता है - ब्रह्म के भी तो चार पाद हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ और विराट ।
फिर राजा ने गांगा की ओर सअंगुष्ठ अंगुलियां की । राजा का तात्पर्य था कि आगे तो सब विश्व पांच तत्व रूप ही है । गांगा ने समझा राजा पांचों मेरे मुख पर मारने की कहता है । तब गांगा ने मुक्का दिखाया । उसका तात्पर्य था - तुम पाँचों से मेरे मुख पर मारोगो तो मैं तुम्हारे मुक्का मारुंगा । राजा ने समझा गांगा कहता है अन्त में तो एक ब्रह्म ही रहता है । द्वैत तो कल्पना मात्र ही है । राजा ने कहा ठीक है । फिर शास्त्रार्थ समाप्त कर दिया ।
उक्त दृष्टांत से ज्ञात होता है कि जिस मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, वह वैसे ही दूसरों के समझता है ।
आपा सुरझे सुरझिया, यह गुरु ज्ञान विचार ॥१३२॥
दृष्टांत -
आम्हां साम्हां उंघ हैं, चोर भरतरी दोय ।
लख्यो भरतरी साधु ही, चोर - चोर ही जोय ॥३३॥
सत भर्तृहरि कीसी वन प्रदेश में रात्रि को भजन कर रहे थे । उनको भूख ने व्यथित कीया । वे प्रातः ही भोजन प्राप्ति के लिए चल दिये । सूर्योदय पर उनको दो चार घर दिखाई दिये । उन घरों में किसान रहते थे । वहां जाने पर एक वृद्ध ने आकर उनको प्रणाम किया । भर्तृहरि ने कहा - भूख लगी है । किसान - भगवन् । रात की रोटी हमारे मिल सकती है किन्तु रात की रोटी आपको नहीं जिमाना चाहते । थोड़ी देर द्वार के भीतर के चबूतरा पर आप विराजें । अभी गर्म रोटी तैयार हो जायगी । द्वार के भीतर के चबूतरे थे बीच में पशु आदि के आने का मार्ग था ।
इतने में एक चोर जो रात्रि भर चोरी के लिए भटका किन्तु उसे कु़छ नहीं मिला । वह भी वहां आ पहुंचा । उसे देखकर वृद्ध किसान ने कहा - भाई ! प्रातः भोजन के समय आये हो थोड़े चबूतरे पर बैठो भोजन करके ही जाना । दूसरे चबूतरे पर चोर बैठ गया ।
चोर की उँघ आती थी उसे देखकर भर्तृहरि ने सोचा - यह भी कोई भजनानंदी संत है रात भर भजन करते थे, इससे ऊंघ आ रही है । चोर ने भी भर्तृहरि को ऊँघते देखकर सोचा - यह भी कोई साधु के भेष में चोर है रात्रि भर चोरी के लिये फिरता रहा है । इससे उसे ऊंघ आ रही है । अतः प्रपंच मे उरझे हुये को उरझा हुआ और सुरझे हुये को सुरंझा हुआ भासता है । व्यक्ति अपने समान ही अन्य को देखता है ।
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सुरझे गुरु का ज्ञान विचारने से सुरझता है इस अर्थ पर दृष्टांत -
एक डून जी साधु पै, छूटू कौन उपाय ।
वृक्ष बाथ उपदेश दे, भूत दिखायो आय ॥३४॥
एक डूम एक संत के सत्संग मे जाता था और सत्संग समाप्ति पर संत से कहता था मुझे कुटुम्ब ने पकड़ रखा है । संत कहते थे तूने कुटुम्ब को पकड़ रखा है । उक्त प्रकार बातें होती ही रहती थी । एक दिन संत प्रातः वन में गये थे । डूम भी अपने पशुओं को लेकर वन में गया था । संत ने उसे देखा और आवाज दी । वह आया और देखा संत एक वृक्ष को बाथ में लिये खड़े हैं ।
संत ने कहा - मुझे इस वृक्ष ने पकड़ लिया है तू छूडा दे । उसने कहा - वृक्ष को तो आपने पकड़ा है । संत - नहीं मुझे वृक्ष ने पकड़ा है, वैसे ही तूने कुटुम्ब को पकड़ा है, तू मुझे कहता है हाथ हटा लो, वैसे ही तू राग हटाकर चला जा । वह चला गया घर पर नहीं आया । कु़छ दिनों बाद लोगों ने सोचा उसे सिंह खा गया है । उसकी स्त्री ने ग्राम से प्रार्थना की - हम ग्राम के सेवक हैं । ग्राम मेरे बच्चों की पोषण करे । ग्राम ने उसके खाने का प्रबन्ध कर दिया ।
दो मास बाद डूम रात को घर जाकर घर के पीछे की ताक से घर में देखा तो उसके बच्चे ने उसका मुख देखकर कहा - बापू बापू । स्त्री बोली क्यों उसे याद करता है । हमको उसके जाने पर पेट भर खाने को मिलने लगा है । यह सुनकर डूम संत की बात सत्य मानकर पीछा ही लौट गया और भगवत् भजन करके सुगति को प्राप्त हुआ । सुरझे गुरु के ज्ञान से उरझा हुआ भी सुरझ जाता है ।
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आपा उरझे उरझिया इस साखी पर तृतीय दृष्टांत स्वामी रामदासजी कहा करते थे । उसका भी दोहा बनाकर यहां दिया जाता है । देखिये -
गंगा तेली भोज ने, कीन्हा मूक विचार ।
नारायण समझे उभय, निजी भाव अनुसार ॥
राजा भोज के समय में उज्जैन नगरी में एक गांगा नामक तेली भी था और अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी भी मानता था । भोज भी उसके अभिमान पूर्णं वचन लोगों से सुनते रहते थे । एक दिन भोज ने सोचा - गांगा के विचारों का पता लगाना ही चाहिये । किन्तु वाणी से तो बात करने योग्य वह नहीं है । अतः उससे मूक शास्त्रार्थ किया जाय, उसी मे उसके विचार ज्ञात हो जायेंगे । राजा ने गांगा को कहलाया, गांगा ने मान लिया ।
फिर राजा ने एक दिन गांगा को अपने सामने बैठाकर गांगा की और एक अंगुली की । उसका तात्पर्य था एक ब्रह्म ही सत्य है । उसे देखकर गांगा ने राजा की ओर दो अंगुली की । उसका तात्पर्य था तुम मेरी एक आँख फोड़ने के लिये एक अंगुली दिखाते हो तो मैं दोनों अंगुलियों से तुम्हारी दोनों आँखे फोड़ दूंगा । राजा ने समझा माया और ब्रह्म दोनों ही अनादि होने से सत्य हैं ।
फिर राजा ने गांगा की और तीन अंगुलियां की । तात्पर्य था की माया तो त्रिगुणात्मिका है - माया, विक्षेपशिक्ति, अविद्या । गांगा ने समझा राजा मेरे मुख पर तीन अंगुलियां मारने की कहता है । अतः गांगा ने राजा की ओर चार अंगुलियां की । उसका तात्पर्य था - तुम मेरे मुख पर तीन अंगुलियां मारोगे तो मैं चार अंगुलियाँ तुम्हारे मुख पर मारुँगा । राजा ने चार अंगुलियाँ देखकर समझा कि गांगा कहता है - ब्रह्म के भी तो चार पाद हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ और विराट ।
फिर राजा ने गांगा की ओर सअंगुष्ठ अंगुलियां की । राजा का तात्पर्य था कि आगे तो सब विश्व पांच तत्व रूप ही है । गांगा ने समझा राजा पांचों मेरे मुख पर मारने की कहता है । तब गांगा ने मुक्का दिखाया । उसका तात्पर्य था - तुम पाँचों से मेरे मुख पर मारोगो तो मैं तुम्हारे मुक्का मारुंगा । राजा ने समझा गांगा कहता है अन्त में तो एक ब्रह्म ही रहता है । द्वैत तो कल्पना मात्र ही है । राजा ने कहा ठीक है । फिर शास्त्रार्थ समाप्त कर दिया ।
उक्त दृष्टांत से ज्ञात होता है कि जिस मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, वह वैसे ही दूसरों के समझता है ।

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