卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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अष्टम दिन ~
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आं वृ. -
“सखि ! यदि तेरा अनुराग, शुद्ध इस भांति रहा ।
अरु धारेगी मन मांहि, निरंतर मोर कहा ॥
तो तेरी मुक्ती मांहिं, कछू संदेह नहीं ।
तू जपना हरि का नाम, भूलना लव न कहीं ॥२९॥’’
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वां वृ. -
“मैं तो जपत रहूँगी नाम, निरंतर निज मन से ।
अरु करत रहूँगी काम, सदा शुभ इस तन से ॥
मैं हिय दैवी गुण धार, रहूँगी शांत सदा ।
अरु बोलूँगी अस बचन, सुनत हों सर्व मुदा ॥३०॥’’
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आं वृ. -
“सखि ! यदि ऐसा करेगी, होगा तव कल्याण ।
शुभाशीष मेरा तुझे, घर को करो प्रयाण ॥३१॥’’
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कवि -
“वाह्य वृत्ति कर प्रणति फिर, चली शीघ्र निज गेह ।
चित्त हटा भव भोग से, एक राम में नेह ॥३२॥
घर के सब ही काम कर, निज अधिकार समान ।
गाढ़ नींद में सो गई, करत राम का ध्यान ॥३३॥’’
इति श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता में अष्टम दिन वार्ता समाप्त: ।
(क्रमशः)

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