रविवार, 29 दिसंबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(अ.दि.- २९/३३)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐

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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
अष्टम दिन ~ 
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आं वृ. - 
“सखि ! यदि तेरा अनुराग, शुद्ध इस भांति रहा । 
अरु धारेगी मन मांहि, निरंतर मोर कहा ॥ 
तो तेरी मुक्ती मांहिं, कछू संदेह नहीं । 
तू जपना हरि का नाम, भूलना लव न कहीं ॥२९॥’’ 
वां वृ. - 
“मैं तो जपत रहूँगी नाम, निरंतर निज मन से । 
अरु करत रहूँगी काम, सदा शुभ इस तन से ॥ 
मैं हिय दैवी गुण धार, रहूँगी शांत सदा । 
अरु बोलूँगी अस बचन, सुनत हों सर्व मुदा ॥३०॥’’ 
आं वृ. - 
“सखि ! यदि ऐसा करेगी, होगा तव कल्याण । 
शुभाशीष मेरा तुझे, घर को करो प्रयाण ॥३१॥’’ 
कवि - 
“वाह्य वृत्ति कर प्रणति फिर, चली शीघ्र निज गेह । 
चित्त हटा भव भोग से, एक राम में नेह ॥३२॥ 
घर के सब ही काम कर, निज अधिकार समान । 
गाढ़ नींद में सो गई, करत राम का ध्यान ॥३३॥’’ 

इति श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता में अष्टम दिन वार्ता समाप्त: ।
(क्रमशः)

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