रविवार, 29 दिसंबर 2013

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卐 सत्यराम सा 卐
The wind cannot shake a mountain. 
Neither praise nor blame moves a wise man. 
☯ Buddha 
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जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ ।
जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे मार्या जाइ ॥२६॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्व संसार या सतगुरु कृपा से संसार में आसक्ति का त्याग करके, परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग भक्ति - वैराग्य में लगें, अर्थात् आत्मचिन्तन में लग कर यदि फिर वृत्ति को बहिर्मुख करें, तो वे पुरुष आवागमन में ही भ्रमते रहते हैं ॥२६॥
दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव ।
आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥२७॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ‘पीछे’ कहिए, संसार के विषय - वासनाओं का चिन्तन नहीं करें, सच्चा सेवक शूरवीर होकर गुरु उपदेश आत्म - चिन्तन के मार्ग पर दृढ़ रहें । एकत्व में आनंद है । ऐसे गुणातीत पुरुषों के अन्तःकरण में विषय - वासनाओं की फुरना नहीं होती है । वे अखंड ब्रह्माकार वृत्ति में लयलीन रहते हैं ॥२७॥ 
पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ ।
दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥२८॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पीछे को कहिये, मायिक अनात्म पदार्थों में दृढ़ता न करे । विवेक वैराग्य आदि साधनों को धारण करें । सच्चे शूरवीर साधक का यही मत हैं कि वह अगम परमेश्‍वर को अन्तःकरण रूप ठौर में प्राप्त करता है ॥२८॥ 
हरि भजतां तजतां विषै, करतां साधू सेव । 
रज्जब रहता इहि जुगति, ह्वै मानुष सौं देव ॥ 
आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ ।
दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥२९॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आत्म प्राप्ति के विवेक - वैराग्य आदि साधनों में चलकर और फिर वापिस प्रवृत्ति मार्ग में आवे, उसका तो मुँह भी न देखें, क्योंकि उसके दर्शनों से कोई लाभ प्राप्त नहीं होता । क्योंकि ‘दोइ दल’ कहिये, द्वन्द्वात्मक वृत्ति में उलझ कर आत्म - विमुख होवे, तो उसको आत्म - स्वरूप प्राप्ति संभव नहीं है ॥२९॥ 
दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ ।
कायर भाजै जीव ले, आ - रण छाड़ै जाइ ॥३०॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो साधन क्षेत्र का मैदान छोड़कर कायरता से वापिस इस संसार के प्रवृत्ति मार्ग में आवे, वह तो कायर है । जैसे शूरवीरों के ब्रतर पहन कर रण भूमि में जावे और युद्ध को देख करके कायरता से भाग छूटे, तो वह सेनापति और राजा को क्या मुँह दिखलावे ? इसी प्रकार कायर साधक त्याग - भाव से अरण्य(वन) में गया हुआ अपनी साधना बीच में ही छोड़कर वानप्रस्थाश्रम से पुनः घर गृहस्थाश्रम में लौट आता है, वह परमेश्‍वर को नहीं प्राप्त हो सकता ॥३०॥ 
(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)

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