सोमवार, 30 दिसंबर 2013

= काल का अंग २५ =(१९/२०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
*दादू काया कारवीं, कदे न चालै संग ।*
*कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥१९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह काया रूप स्थूल शरीर कारवी कहिए, अविद्या की रची हुई, चैतन्य रूप प्राणों के साथ, कभी भी संग नहीं चलेगी । चाहे करोड़ वर्ष की आयु होवे, तब भी अन्त में यह नाश को ही प्राप्त होगी ॥१९॥
चार पुरुष भाड़ै लई, बनी कोटड़ी चार । 
कहीं भाड़ो हमरो यह, कबहुं देहुं निकार ॥
दृष्टान्त ~ चार पुरुषों ने एक कोटड़ी किराये ली । मकान मालिक ने कहा ~ मैं चाहूँगा, तभी खाली करवा लूंगा । एक ने उसमें तमाम घर का जखीरा ला कर भर दिया । दूसरे ने खाने - पकाने का सामान रखा । तीसरे ने केवल अपना बिस्तर ही लाकर रखा । चौथा उसमें खाली लेट लगाकर चला जावे । मकान मालिक ने एक रोज कहा ~ तुम लोगों ने तो अब तक किराया नहीं दिया, इसलिये कोटडी खाली कर दो । 
पहले नम्बर के मनुष्य को बहुत भारी दुःख हुआ । दूसरे को उससे कम दुःख हुआ । तीसरे को दूसरे से कम दुःख हुआ । चौथे को ना बराबर दुःख हुआ, क्योंकि वह कुछ रखता ही नहीं था । इसी प्रकार काल - भगवान से, यह शरीर नाम की कोटडी, पामर, विषयी, जिज्ञासु, मुक्त, इन चारों ने ली । पामर इसमें पूरा अध्यास कर बैठा, विषयी इसमें उससे कम, केवल विषय - सुख का उपभोग करने लगा । जिज्ञासु ने इसमें साधन साधने का ही अध्यास किया । मुक्त को इसमें किसी प्रकार का अध्यास नहीं था ।
काल - भगवान ने सहसा आदेश दिया कि कोटड़ी खाली कर दो । जितना जितना जिसको शरीर में अध्यास रूप ममत्व था, उतना उतना उनको दुःख हुआ । ज्ञानी को किंचित् भी अध्यास नहीं था, सो उसको इसके त्यागने में जरा सा भी दुःख नहीं हुआ ।
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*कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण ।*
*दादू सो कतहुँ गया, माटी धरी मसाण ॥२०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिस शरीर के द्वारा चेतन कहता था, सुनता था, देखता था, लेता था, देता था, न मालूम वह चेतन रूप प्राण किधर से निकल गया और व्यावहारिक सगे - सम्बन्धी शमशान में ले जाकर जलाते हैं या दफनाते हैं ॥२०॥
चला जात बाजींद मग, ऊँट पड्या इक देखि । 
कई उठायो ना उठै, चेतन गया अलेख ॥
दृष्टान्त ~ बाजींद जी नवाब थे । दौरा करते हुए आ रहे थे । रास्ते में इनके सामान का ऊँट जा रहा था । एक जगह वह ऊँट बैठ गया । नौकरों ने सामान उतार कर अलग रख दिया । ऊँट मृत्यु को प्राप्त हो गया । पीछे से बाजींद जी आये । देखकर बोले ~ ‘‘भई ! कैसे बैठे हो ! कहा ~ हुजूर ! ऊँट मर गया ।’’ उन्होंने पूछा ~ ‘‘इसका क्या मर गया ? यह तो सोया हुआ है ।’’ चारों तरफ घूमकर देखा और बोले ~ ‘‘नखशिख तो कुछ बिगड़ा नहीं ?’’ अर्थात् इसके अवयव तो खराब नहीं हुए ? नौकर बोले ~ ‘‘इसमें चेतन था, वह निकल गया ।’’ 
वहीं बाजींद जी को भय हो गया । और बोले ~ ‘‘घर भी नहीं पहुँचाये ?’’ नौकर बोले ~ ‘‘घर पहुँचाने का कोई नेम नहीं होता है ।’’ यह सुनकर विचार किया कि इस मेरे शरीर में से भी चेतन, ऐसे ही जा सकता है, उसी वक्त राज का त्याग करके ब्रह्मऋषि दादू दयाल महाराज की शरण में आमेर पहुँच गये । परम गुरुदेव को नमस्कार किया और उनके उपदेश सुनकर हृदय में विरह - भक्ति जागृत हो गई । वह विरह के द्वारा, सत्यस्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करके जीवन - मुक्त हो गये ।
(क्रमशः)

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