गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

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卐 सत्यराम सा 卐
विचार 
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार । 
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥१२॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अध्यात्म, आधिदैविक, आधिभौतिक, जन्म और मरण, इन सब ही दुःखों की निवृत्ति का साधन एक ब्रह्म विचार ही है । जब ब्रह्म तत्त्व को महावाक्यों के विचार द्वारा निश्‍चय करने से परमानन्द की प्राप्ति होती है । फिर ‘गँवार’ कहिए, विषय में आसक्त, बहिर्मुख, अज्ञानी जीवन - मुक्त पुरुषों के लिये चाहे कुछ भी कहते रहो ॥१२॥ 
संसार - दीर्घ - रोगस्य स्वविचारमटौषधम् । 
कोऽहं, कस्य च संसारो ? विवेकेन विलीयते ॥ 
(विचार का अंग ~ श्री दादूवाणी)
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विवेक एवं विचार से जीवन की समस्याओं का समाधान सहज ही किया जा सकता है ~ 
एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था। एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत की। राजा का कहना था कि मार्ग में जो कंकड़ पत्थर थे वे मेरे पैरों में चुभ गए और इसके लिए कुछ इंतजाम करना चाहिए। 
कुछ देर विचार करने के बाद उसने अपने सैनिकों व मंत्रियों को आदेश दिया कि देश की संपूर्ण सड़कें चमड़े से ढंक दी जाएं। राजा का ऐसा आदेश सुनकर सब सकते में आ गए। लेकिन किसी ने भी मना करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह तो निश्चित ही था कि इस काम के लिए बहुत सारे रुपए की जरूरत थी। लेकिन फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद राजा के एक बुद्घिमान मंत्री ने एक युक्ति निकाली। उसने राजा के पास जाकर डरते हुए कहा कि मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ। 
अगर आप इतने रुपयों को अनावश्यक रूप से बर्बाद न करना चाहें तो एक अच्छी तरकीब मेरे पास है। जिससे आपका काम भी हो जाएगा और अनावश्यक रुपयों की बर्बादी भी बच जाएगी। राजा आश्चर्यचकित था क्योंकि पहली बार किसी ने उसकी आज्ञा न मानने की बात कही थी। उसने कहा बताओ क्या सुझाव है। मंत्री ने कहा कि पूरे देश की सड़कों को चमड़े से ढंकने के बजाय आप चमड़े के एक टुकड़े का उपयोग कर अपने पैरों को ही क्यों नहीं ढंक लेते। राजा ने अचरज की दृष्टि से मंत्री को देखा और उसके सुझाव को मानते हुए अपने लिए जूता बनवाने का आदेश दे दिया।
यह कहानी हमें एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है कि हमेशा ऐसे हल के बारे में सोचना चाहिए जो ज्यादा उपयोगी हो। जल्दबाजी में अप्रायोगिक हल सोचना बुद्धिमानी नहीं है। दूसरों के साथ बातचीत से भी अच्छे हल निकाले जा सकते हैं।

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