गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

= १२६ =


卐 सत्यराम सा 卐
Tintin Cung ~ Santmat 
At midnight, the moon and stars were visible, the surat rose upwards like a yo-yo and the sky burst, and Surat crossed it. 
When the longing and yearning become keen, my Surat and Nirat reached the mansion and met the Beloved there, who bestowed great love; and the heaven opened up. 
I saw the beginning and the end of everything. But how I describe what I saw? The secret remains secret. 
Dadu says "I know this much that what I obtained was obtained by applying myself to spiritual endeavours. Nowhere else did I find the Truth. I am now relieved of the pain and suffering of recurrent birth and death. 
~ Dadu Saheb; Sant Sangrah; Part 2 ~ 
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दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।
सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥२१॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी मानसिक वृत्तियों को बाहर के विषयों से बदल कर अपने आत्मस्वरूप में स्थिर करो । हे बावले ! वह ब्रह्मतत्व, जिसके लिए तू बाहर भटकता है, वह तो तेरे समीप ही है । किन्तु बाहरी विषयों की बाण(आदत) को तज करके अन्तर में ढूंढेगा, तो स्वस्वरूप आत्मा का तू साक्षात्कार करेगा ॥२१॥ 
देह मध्ये स्थितं कथं मूढ ! न पश्यसि ? 
वाचाजल्पो वृथाSयं तु नि:शब्दं ब्रह्म उच्यते ॥ 
तेरा तेरे पास है, जहाँ उठत है श्वास । 
तहाँ तू गोता मार ले, सांई तेरे पास ॥ 
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सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन ।
लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥२२॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वही पुरुष सुबुद्धिमान् है, जो अपनी सुरति को बहिर्मुख से अन्तर्मुख लाकर आत्म - सन्मुख होते हैं और सर्व जगत के गुरु, गर्भवास में उपदेश करने वाले परमात्मा, के स्वरूप में अखंड लयलीन रहते हैं ॥२२॥ 
मत्तगयन्द छन्द
देखि विचार सँभार सदा हरि, 
साधन सैं कछु सीख तरीको । 
काम रु क्रोध तजो विषिया सुख, 
ताहि तैं होइ तु बात खरीको । 
डिम्भ गुमान अज्ञान अरे नर ! 
त्याग करो जु सबै जग फीको । 
आतम अंतर आप पिछानहु, 
उत्तम छंद हरी भज नीको ॥ 
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सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
जहँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥२३॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवात्मा के हृदय स्थान में ही वह समष्टि चेतन राम है और वही ब्रह्मतत्व सर्वत्र व्यापक है । इसलिये बहिरंग सम्पूर्ण साधनों को त्याग कर स्वस्वरूप में ही लय लगाइये ॥२३॥ 
रज्जब लै मगि लांघिये, पावे लोक अनन्त । 
आतम के अन्तर उठै, कामिनी पावै कंत ॥ 
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दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ ।
यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥२४॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मन को स्वस्वरूप में लगाकर, ब्रह्म अनुसरणी वृत्ति द्वारा, परमेश्वर का गुणानुवाद गाइये । तब फिर यह मन श्रद्धा विश्वासरूपी ताल बजा कर आत्मा का चिंतन कर - करके नृत्य करे अर्थात् परम प्रफुल्लित होकर सहज स्वरूप में ही मस्त हो जाय ॥२४॥ 
रज्जब लाहा में लाभ ल्यौ, टूटै टोटा हानि । 
सावधान साधे रहो, रे जीव जीवन जानि ॥ 
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दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल ।
यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगै दीन दयाल ॥२५॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उपरोक्त कथन का ही स्पष्टिकरण करते हैं कि जिज्ञासुओं का मन ब्रह्म - सुरति द्वारा स्वरूप - बोध रूपी गायन करके नाम - स्मरण रूप ताल बजावे । फिर इस प्रकार प्रेमाभक्ति में अभेद होना ही मानो मनोहर नृत्य है । अब इस अपूर्व नृत्य को देखने वाले स्वयं परमेश्वर ही हैं ॥२५॥ 
(श्री दादूवाणी ~ लै का अंग)

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