शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

= काल का अंग २५ =(१३/१४)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*काल का अंग २५*
*काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ ।*
*दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥१३॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे काठ का कीड़ा, काठ को भीतर ही भीतर खाकर जर्जर बना देता है, इसी प्रकार इस शरीर रूप काठ को कामादि काल, भीतर ही भीतर खाकर, जर्जर बना देते हैं । और मनुष्य - जन्म को निरर्थक ही खत्म कर देता है । दिनों - दिन इस जीव की इसी प्रकार ‘आयु’ कहिये उम्र घटती जाती है, परन्तु यह अज्ञानी जीव चेत नहीं करता है ॥१३॥
.
*काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास ।*
*पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥१४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! विषयासक्त जीव के शरीरों को काल - भगवान, दिन - दिन, घड़ी - घड़ी, छिन - छिन, पल - पल, में श्वास - श्वास पर ग्रावसत् खा रहा है । परन्तु अज्ञानी जीव, काल से बचने के लिये प्रभु का स्मरण फिर भी नहीं करते ॥१४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें