*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“सप्तम - तरंग” ३३-४)*
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*आमेर की ओर प्रस्थान*
वर्ष द्वादश गुरु तपे, साँभर शहर सुथान ।
साँभर तजि आमेर कों, स्वामी कियो प्रयान ॥३३॥
माधवदास वर्णन करते हैं कि - श्री दादूजी साँभर धाम में बारह वर्ष तपस्या - रत रहे, परचे दिये, परोपकार किये । फिर आमेर की ओर प्रस्थान किया ॥३३॥
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*दामोदर उमा को वरदान सांभर में लूंग काली मीरच*
साँभर में इक विप्र दामोदर,
दादूदयालु हिं सेवक भारी ।
तात नहीं घर, स्वामि कुं सेवत,
नाम उमा उनके घर नारी ।
मार्जन भोजन सेव करे नित,
विप्र बहूविध भक्ति विचारी ।
एक समै गुरु होत प्रसन्न जु,
देव कुसुम्म दई मिरच चारी ॥३४॥
साँभर में एक दामोदर नामक विप्र श्री दादूदयालजी की बहुत सेवा करता था । उसके घर पुत्र नहीं हुआ था - एतदर्थ पुत्रकामना से दामोदर तथा उसकी अतिथि, पत्नि उमा स्वामीजी की सेवा में लगे रहते । आश्रम स्थान की समार्जन, भोजन, जलपूर्ति आदि विविध सेवायें करते रहते और भक्तिमें लीन रहते । एक दिन स्वामीजी ने प्रसन्न होकर प्रसाद रूप में लौंग २ और काली मिर्च २ उन्हें दी ॥३४॥
(क्रमशः)

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