रविवार, 29 दिसंबर 2013

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卐 सत्यराम सा 卐
"You cannot transmit wisdom and insight to another person. The seed is already there. A good teacher touches the seed, allowing it to wake up, to sprout, and to grow." 
~ Thich Nhat Hanh ~ 
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शिष्य जिज्ञासा 
जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ। 
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥४२॥ 
टीका ~ जिस प्रभु ने हमारी रचना की है वह कहाँ है ? हे सतगुरु! कृपा करके उस अन्तर्यामी का प्रत्यक्ष ज्ञान कराओ । हे शिष्य ! जीवात्मा उसका जो दिल ह्रदय गुहा(गुफा) बुद्धि है, उसमें मालिक कहिये तेरा प्रभु विराजता है । उस जगह अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में ही मन की वृत्तियों को तत्स्वरूप बनाओ ॥४२॥ 
पूर्व साखी में सतगुरु ने प्रभु को ह्रदय में बताया है, किन्तु अविद्या का पड़दा दूर नहीं होने से शिष्य को स्वरूप का बोध नहीं होता है । अब शिष्य पुन: सतगुरु से नम्र भाव से, अविद्या अन्धकार दूर करने की प्रार्थना करता है । 

मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ । 
आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥४३॥ 
टीका ~ हे दयामूर्ते ! यदि मेरा मालिक मेरे अन्दर ही है, तो "पड़दा'' कहिये अविद्या अन्धकार को हटा करके आत्मसाक्षात्कार कराओ । हे सतगुरो ! आप दयालु हो, इसलिए मेरे चित्त को प्रभु भक्ति में एकाग्र करके, सर्वव्यापक प्रभु का साक्षात्कार कराइए एवं अपरोक्ष रूप से मुझ अज्ञानी को प्रत्यक्ष दर्शन कराइए ॥४३॥ 

भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ । 
सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलि बलि जाइ ॥४४॥ 
टीका - हे गुरुदेव! मैं तन, मन, धन, वचन, आदि आपके भेंट करता हूँ और मैं आपकी बारंबार वन्दना करता हूँ । क्यों ? किस लिए ? "भरि भरि प्याला प्रेम रस अपणे हाथ पिलाइ"- अर्थात् अपने हित भावनारूपी हाथों से प्रेमरूपी प्याला रामरस से भर-भर कर बारंबार पिलाइए । यही आपसे प्रार्थना है ॥४४॥ 

जब सतगुरु ने परमेश्वर को जिज्ञासु के हृदय में ही बताया है, तो अब शिष्य स्वयं ही आत्मसाक्षात्कार कर लेगा । आप सतगुरु की वन्दना क्यों करते हो ? इसका उत्तर कहते हैं । 
सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ । 
दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥४५॥ 
टीका - दशों दिशाओं में अपार समुद्र भरा हुआ है तथापि "पक्षी प्यासा जाइ" - कहिये जलाशय यदि बिना घाट का है, तो प्यासे पक्षी आदि उसमें कैसे जल पी सकते हैं ? अर्थात् प्यासे ही उड़ जाते हैं । इसी तरह द्रष्टान्त में भी है, जो संसार है, वह दशों - दिशाओं में जलरूपी सरोवर की भाँति व्यापक है और जो आनन्द चैतन्य है, वह अगाध एवं अपार, मनन्द्रियों से न जानने योग्य है और पक्षी आदि की भाँति जो अज्ञानी जिज्ञासु - जन हैं, वे "आइ" इस संसार में आ करके प्यासा यानी आत्म-साक्षात्कार के बिना, दु:खी ही चला जाता है, क्यों ? 'दादू गुरु प्रसाद बिन क्यों जल पीवै आइ' अर्थात् सतगुरु की कृपा ही मानों इस सागर से राम-रस रूपी जल पीने का घाट है और उसके नहीं प्राप्त होने से यह जीव प्रभु की महिमा कैसे पहचान सकता है ? सतगुरु कृपा से ही मुमुक्ष का कल्याण होता हैं ॥४५॥ 
"पानी में मीन पियासी..." कबीर 
अब सतगुरु कृपा से ही आत्म-साक्षात्कार होना सम्भव है तो स्वयं सतगुरु की कृपा करके क्यों न ज्ञान देवें ? जो समर्थ होकर भी उपदेश नहीं देते हैं, तो उन्हीं को दोष होवेगा ? 

अब इसके उत्तर में निरूपण करते हैं :- 
सतगुरु बेपरवाही 
मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ । 
दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥४६॥ 
टीका - अपार जलाशय में भरपूर जल होता है, जिसको प्यास हो, वह स्वयं पिपासु ही आकर मानसरोवर में जल पीता है । मानसरोवर किसी के घर-घर में नहीं कहता फिरता है कि निर्मल जल पीओ । इसलिए उसको कोई व्यवहार में दोष नहीं देता । इसी प्रकार सतगुरु तो मानसरोवर रूप हैं और उनमें जो आत्म-अनुभव रूप जो जल भरा हुआ है, उसको उत्तम जिज्ञासु, सतगुरु की शरण में आ करके आत्मा का अनुभव करता है । किन्तु सतगुरु "घर-घर" - कहिए अनधिकारी, बिना जिज्ञासा कहिए, बिना इच्छा वाले को आत्म-उपदेश नहीं करते हैं । इसमें सतगुरु का दोष नहीं है ॥४६॥ 
वर परमोधै आन को, पूछे तैं वरीयान । 
बतलायां बोलै नहीं, सो वरिष्ठ क र जान ॥ 
अब सतगुरु तीन श्रेणी के माने गऐ हैं :- "वर", "वरियान", "वरिष्ठ" । वर श्रेणी के सतगुरु अधिकारी अनधिकारी का विचार न करके परोपकार भावना से जीव-मात्र को सत्योपदेश करते हैं किन्तु "वरीयान" व्यवहार कोटि से मुक्त होते हैं एवं इच्छा करने पर ही शिष्य को उपदेश करते हैं । और "वरिष्ठ" श्रेणी के सतगुरु देहाध्यास से मुक्त अर्थात् विदेह होकर रहते हैं । ऐसे महात्माओं के दर्शनों से ही अपूर्व लाभ होता है । अब तीसरी श्रेणी के सतगुरु की महिमा कहते हैं । 
कवित्त 
"चन्द कमोद अचाह, अलि क द कँवल बुलावै । 
दीपक दलन पतंग, आप अहि चंदन आवै ॥ 
सरित हु समन्द निरास, धोम आकाश न आसा । 
धर उर ध्यान न धाम, होहि घर बड़ा तमासा ॥ 
मुकुर मनोरथ को न मुख पाठों पाठ न भाव ही । 
रज्जब गुरु बेसास बिधि सिरज्या सिर सो आव ही ॥ 
दोहा :- 
"निर पिलावत कहा फिरै, सायर घर घर बार । 
प्यासा होगा प्रेम का, तो पीवैगा झख मार ॥" 
सागर कदे न जायसी, घर घर प्यावन नीर । 
प्यासा भंजन भरि पीवै "साधु" सरोवर तीर ॥ 
साधुरामजी मांडोठी । 
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)

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