शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(अ.दि.- १९/२०)


卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
अष्टम दिन ~ 
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लखा एक मैं अचरज भारी, 
धर्म करत मरती इक नारी ।
है वह कृपया नारि मैं जानी, 
नहिं आपद वह जान सयानी ॥१९॥
आं वृ. - “मैंने एक महान आश्‍चर्य देखा है कि एक स्त्री धर्म करने से मर जाती है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “वह तो कृपया स्त्री होगी । कृपया स्त्री को धर्म कार्य सहन नहीं होता ।’’
आं वृ. - “नहिं, सखि ! यह विपत्ति है । धर्म कार्य करने से परिणाम में सभी दु:ख नष्ट हो जाते है । तू भी धार्मिक कार्यों में अधिक भाग लिया कर ।’’
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सेवन करतां कड़वा लागे, 
फल परिणाम मधुर दुख भागे ।
वृक्ष नीम का मैं पहचानी, 
नहिं, कठोर तप जान सयानी ॥२०॥
आं वृ. - “एक सेवन करते समय तो कटु लगता है किन्तु उसके सेवन का अन्तिम फल दुखनाशक होने से मधुर ही लगता है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “नीम का वृक्ष है । खाने में कड़वा है परन्तु कोढ़ को भी मिटा कर सुखी करता है ।’’ 
आं वृ. - “नहिं, सखि ! यह तो कठोर तप है । करते समय तो कष्ट होता है किन्तु परिणाम में उत्तम फल प्राप्त होता है । तू तपस्या के समय व्याकुल नहीं होना । साधक को साध्य की प्राप्ति से पहले कभी भी साधन नहीं छोड़ना चाहिये । तू भी ब्रह्म प्राप्ति से पूर्व अपना साधन न तजना ।’’ 
(क्रमशः)

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