रविवार, 29 दिसंबर 2013

दादू जन ! कु़छ चेतकर ९/८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*चेतावनी का अंग ९/८*
* दादू जन ! कु़छ चेतकर, सौदा लीजे सार ।* 
* निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥८॥* 
दृष्टांत - 
एक फकीर घर गार के, बेचत लहै परलोक । 
सेठ मरा सिक्का मिला, देखे सारे थोक ॥२॥ 
एक फकीर ग्राम के पास की नदी तीर पर बैठकर मिट्टी ता घर बना रहे थे । नदी से पानी भरने वाले सिक्के ने पू़छा - इस घर का क्या करोगे ? फकीर - बेचेंगे । सिक्का - लेने वाले को क्या लाभ होगा ? फकीर - परलोक में महल मिलेगा । सिक्का - क्या लोगे ? फकीर - सवा रुपया । सिक्का ने सवा रुपया दे दिया और फकीर ने वह घर उस को दे दिया । सिक्का उसे लेजा तो सकता नहीं था । वहां ही छोड़ गया । 
फिर वहां के एक सेठ की मृत्यु हो गई । उसको परलोक में ले गये । वहां उसने देखा । एक सुन्दर भवन बन रहा है । फिर पू़छा - यह किस के लिये बन रहा है ? उत्तर मिला तुम्हारे ग्राम के सिक्के के लिये बन रहो है । फिर सेठ को देखकर यमराज ने यमदूतों को कहा - यह तो दूसरा है इसे शीघ्र इसके स्थूल शरीर में पहुँचा कर और इसी नाम का इसके वास में रहता हैं उसे लाओ, फिर सेठ पुनः जीवित हो गया । 
उसे परलोक के भवन की बात याद रही अतः जब सिक्का मिला तब उससे पू़छा - तुमने ऐसा कौन सा पुण्य किया था जिससे परलोक में तुम्हारे लिये सुन्दर भवन बन रहा है । सिक्का ने फकीर से घर लेने की बात सुना दी । 
एक दिन सेठ भी नदी पर गये और फकीर को मिट्टी का घर बनाते देखकर पू़छा - इसका क्या करोगे ? फकीर - बेचेंगे । सेठ - क्या लोगे ? फकीर - एक हजार । सेठ - सिक्के को तो सवा रुपये में दिया था, मुझसे हजार कैसे माँगते हो ? फकीर - तुम तो सब प्रत्यक्ष देखकर आये हो । सेठ - हजार रूपयों का क्या करोगे ? फकीर - परमार्थ में लगा देंगे । सेठ ने हजार रुपये दे दिये । फकीर ने सब पुण्य में लगा दिये । सोई उक्त ८ की साखी में कहा है - उक्त प्रकार सार(सत्य) सौदा(व्यापार) करना चाहिये । कारण ? शुद्ध कमाई के बिना संसार से छुटकारा कभी भी नहीं मिलता । 
===
द्वितीय दृष्टांत - 
संत एक सुकृत करे माथे ले ले दाम । 
इक अनाथ सुत बाणिक हित, हुनि बरसाई राम ॥३॥ 
एक परोपकारी संत कर्ज करके भी परोपकार करते थे । एक अनाथ वैश्य का लड़का उनकी शरण गया । तब उसके लिये वे कर्ज लाने गये किन्तु कर्ज देने वाले ने कहा - आप पहले का कर्ज चुका देंगे तब ही नया कर्ज आप को मिलेगा । आप पर बहुत कर्ज हो गया है । उसने कुछ भी नहीं दिया । 
किन्तु उस अनाथ वैश्य पुत्र की स्थिति देख कर वे संत व्याकुल हो गये थे । अतः उन्होंने भगवान् से प्रार्थना करके वैश्य पुत्र को कहा - आज ही भगवान् तेरे घर हुनि(हुण) सोना चांदि धन की वर्षा कर देंगे । यह वचन एक दूसरे वैश्य ने सुना तो उसने सोचा - बहुत धन वर्षेगा । 
अतः उसने उस अनाथ वैश्य पुत्र से कहा - हम दोनों घर बदल लें मेरे घर में तुम शरीर मात्र से आ जाओ और सपरिवार मैं तुम्हारे घर केवल तन के कपड़ों से आ जाऊंगा । यह अपने पांच पंचों के बीच लिखावट करले । वैश्य पुत्र ने कहा - ठीक है । वैसे ही कर लिया । 
अब उक्त वैश्य धन वर्षा के लिये अति व्याकुल हुआ किन्तु कु़छ भी नहीं वर्षा । तब कुल वालों ने तथा सेठ ने उक्त संत से कहा - धन वरसा तो नहीं । संत ने कहा - जिसे के लिये कहा था उसके लिये तो वरस गया । तुम्हारे लिये तो मैंने नहीं कहा था । सोई उक्त साखी में कहा है - शुद्ध कमाई से छुटकारा होता है । कपट की कमाई से तो उक्त सेठ के समान दुःख में ही पड़ता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें