सोमवार, 28 अप्रैल 2014

= सुन्दरी का अंग ३० =(१९/२०)

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण ।* 
*दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥१९॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्ची पतिव्रता देवी, अपने मन से, अपने पति के ऊपर, नैन - बैन न्यौछावर करती है । अर्थात् सिवाय अपने पति के, न तो नेत्रों से किसी को पुरुष भावना से देखती है और न पति की सिवाय, अपने मुख से किसी का यश कहती है । अपना तन - मन और प्राण, ये सब पति के समर्पित करती है और कहती हैं कि हे पतिदेव ! आप ही मेरे सर्वेसर्वा हैं, मैं आपके ऊपर न्यौछावर जाती हूँ । अथवा संत - वृत्ति सुन्दरी, शरीर के स्थूल, सूक्ष्म संघात सहित, अपने उपास्य देव के आप समर्पित हो गई ॥१९॥
*तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण ।*
*सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥२०॥*
टीका ~ हे परमेश्वर ! यह तन आपका दिया हुआ, आपकी आराधना द्वारा, आपके ही अर्पण करते हैं और मन भी आपके अर्पण है । यह प्राण और स्थूल शरीर, यह सब आपका दिया हुआ, निष्काम कर्मों द्वारा, आपके ही अर्पण करते हैं । स्थूल, सूक्ष्म सौंज सब आपके अर्पण है और आप हमारे हो । यही आपके अनन्य भक्तों का ज्ञान है ॥२०॥
(क्रमशः)

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