सोमवार, 28 अप्रैल 2014

*कहता सुनता देखता ~ २०/२५*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/२०*
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*कहता सुनता देखता, लेता देता प्राण ।*
*दादू सौ कतहूं गया, माटी धरी मशाण ॥२०॥*
दृष्टांत -
चले जात बाजन्द मग, ऊंट पड़ा इक देख ।
कहा उठाओ को उठै, चेतन गया अलेख ॥३॥
बाजिन्द बुखारा बादशाह के पुत्र थे । इनके पिता को एक ज्योतिषी ने कहा था तुम्हारा पुत्र बाजिन्द महान् त्यागी भक्त होगा । यह सुनकर बादशाह डर गये और बाजिन्द को विषय सुखों में निमग्न कर दिया तथा नगर में ऐसी व्यवस्था कर दी कि किसी की मृत्यु की खबर बाजिन्द को नहीं मिले ।
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इन्हीं दिनों में स्वयं बाजिन्द के पिता की मृत्यु हो गई किन्तु उसका पता बाजिन्द को नहीं लगने दिया और कह दिया कि बादशाह हज करने गये हैं । एक दिन बड़े ठाट - बाट से बाजिन्द की सवारी एक गांव से दूसरे गांव को जा रही थी । दो पर्वतों के बीच में संकुचित मार्ग में सबसे आगे के इक डंके वाले ऊंट की मृत्यु हो गई । मार्ग रुक गया । इससे सब रुक गये ।
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बाजिन्द हाथी से उतर कर आगे बढ़े और ऊंट को पड़ा देखकर दीवान को कहा - ऊंट को जल्दी खड़ा करो । दीवान ने कहा - यह मर गया है अब खड़ा नहीं हो सकता । बाजिन्द - इसका क्या मर गया ? यह तो ज्यों का त्यों है । दीवान - इसका जीव निकल गया है, अब इसका शरीर बेकाम हो गया । बाजिन्द - मेरे शरीर से भी जीव निकल जायगा, तब इसे भी भूमि में गाड़ा जायगा क्या ? दीवान - जी हां ।
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बाजिन्द - फिर इस जीव का उद्धार कैसे हो ? दीवान - संत कहते हैं ईश्वर के भजन से उद्धार होता है । बाजिन्द - फिर मैं तो वही मार्ग पकड़ता हूँ जिस में चलने पर मृत्यु को भय नहीं रहता है और शांति का सम्राज्य है । तुम सवारी को वापस लौटा ले जाओ । यह कहकर बाजिन्द वन को चले गये और निरंतर प्रभु भजन करते हुये अन्त में प्रभु को ही प्राप्त हुये ।

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