सोमवार, 28 अप्रैल 2014

= त्र. त./२९-३० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” २९-३०)* 
शाह कहे - गुरु सूरज रूप जु, 
तेज छिपै नहिं बाद घनेरे ।
साफ भयो दिल, ज्ञान सुन्यो तब, 
पीर सचा, खुद देखहु नेरे ॥ 
मैं दरबार लगाय बुलावहुं, 
आपहि देखहु संत सुकुरे ।
देखन कूं अजमात जुड़े सब, 
नाहिं लखी करता गति तेरे ॥२९॥ 
तब बादशाह ने कहा - गुरुदेव श्री दादूजी सूर्य के समान ज्ञान से प्रकाशित हैं, उनका तप तेज वाद विवाद के बादलों से नहीं छिप सकता । उनका ज्ञान सुनकर मेरा दिल साफ हो गया है, वे सच्चे पीर है । तुम्हें विश्‍वास नहीं हो तो खुद समीप जाकर आजमा लो फिर यकीन हो जावेगा । अच्छा मैं कल दरबार लगाकर, वहाँ उन्हें बुलाता हूँ । तब तुम सब लोग देख परख कर यकीन कर लेना । बादशाह की बात सुनकर संत श्री दादूजी की करामात देखने के लिये दरबार में लोगों की भारी भीड़ जुड़ गई । वे मूढ लोग सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर की लीला और संतों की गति भला क्या पहिचाने ॥२९॥ 
*बड़ा भारी दरबार लगा*
आसन बेगि बिछाय अकैंबर, 
भूपति को गुरु पास पठाये ।
भूपति बेगहिं जाय कही गुरु, 
शीश निवाय वृतान्त सुनाये ॥ 
संत विचारत जानत हैं सब, 
ज्यों हरि चाहत होवत आये ।
काजि मुल्ला दरबार जुड़े सब, 
व गुरु आसन देत छिपाये ॥३०॥ 
अकबर ने शाही दरबार में बिछायत करवा कर राजा भगवानदास को भेजा ताकि संत श्री दादूजी को सादर बुला लावे । राजा ने जाकर संत चरणों में शीश निवाया, और दरबार में पधारने हेतु बादशाह का निवेदन सुनाया, तथा इस दरबार के आयोजन का वृतान्त भी सुनाया । अन्तर्यामी संत जान गये और विचार किया कि श्री हरि जो लीला करवाना चाहते हैं, उसका समय आ गया है । दरबार में काजी मुल्लाओं की भीड़ जुटी हुई थी । कुछ धूर्तों ने संत के लिये बिछाया गया था, उस आसन छिपा दिया ॥३०॥ 
(क्रमशः) 

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