#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार ।*
*त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥२१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! पतिव्रता स्त्री अपने पति को, अनेकों प्रकार की सेवा द्वारा, अपने वश कर लेती है । इसी प्रकार अनन्य भक्तों की वृत्ति रूप सुन्दरी, निर्वासनिकता आदिक भाव द्वारा, सृष्टि - कर्त्ता परमेश्वर को रिझा लेती है ॥२१॥
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*नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार ।*
*दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥२२॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज कहते हैं कि आशा तृष्णा रूप ही तो नदी है मन के मनोरथ ही इसमें जल है और संसार ही दरियाव है । परन्तु इसके अध्यास को छोड़ना ही पार होना है । इस साधना द्वारा जो मुमुक्षुओं की वृत्ति रूप सुन्दरी अधिष्ठान - चैतन्य से अभेद होती है, वही धन्य है ॥२२॥
(क्रमशः)

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