#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
उपज्यो प्रपंच अनादिको,
यह महामाया विस्तरी ।
यह महामाया विस्तरी ।
नानात्व ह्वै करि जगत भास्यो,
बुद्धि सबहिन की हरी ॥
बुद्धि सबहिन की हरी ॥
जिनि भ्रम मिटाय दिखाय दीयो,
सर्व व्यापक राम हैं ।
सर्व व्यापक राम हैं ।
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु,
ताहि मोर प्रणाम हैं ॥
ताहि मोर प्रणाम हैं ॥
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श्री योगवशिष्ठ महारामायण ~
श्री योगवशिष्ठ महारामायण ~
ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक अद्वैत आत्मसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है; उसमें नानात्व आभास होते हैं पर वह भ्रममात्र है - वास्तव में ये सब अपने आप एक अनुभव सत्ता है ।
प्रश्न :- जो एक अनुभवसत्ता और मेरा अपना आप है तो मैं इतने काल से क्यों भ्रमता रहा ?
उत्तर :- हम अविचाररूप भ्रम से भ्रमते रहे हैं । विचार करने से भ्रम शान्त हो जाता है । भ्रम और विचार भी दोनों अपने ही स्वरूप हैं और हमको ही उपजे हैं । जब हमको अपना विचार होगा तब भ्रम निवृत्त हो जावेगा । जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही विचार से द्वैतभ्रम नष्ट हो जावेगा और जैसे रस्सी के जाने से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है और सीप के जाने से रूप भ्रम नष्ट हो जाता है वैसे ही आत्मा के जाने से आधिभौतिक भ्रम शान्त हो जावेगा ।

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