मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

*सींगी नाद न बाज ही ~ २१/२५*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/२१*
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*सींगी नाद न बाज ही, कत गये सो जोगी ।*
*दादू रहते मढ़ी में, करते रस भोगी ॥२१॥*
प्रसंग कथा -
गुरु दादू आमेर थे, ढिग जोगी का थान ।
इक दिन सींगी ना बजी, मरगा जोगी जान ॥४॥
गुरुदेव दादूजी जब आमेर में निवास करते थे तब उनके आश्रम के पास ही एक नाथयोगी का भी स्थान था । उस स्थान में वह योगी अपने भक्तों द्वारा लाये हुये अनेक रसों का उपभोग करते थे और सायं, प्रातः सींगी नाद भी बजाते थे । एक रात्रि को उनका देहान्त हो गया । इससे प्रातः सींगी नहीं बजी । दादूजी तो अपने समय पर शारीरिक क्रिया करते ही थे ।
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एक शिष्य ने कहा - स्वामिन् ! अभी तो योगी की सींगी भी नहीं बजी है, अतः रात्रि बहुत है । तब दादूजी ने उक्त २१ कि साखी सुनाकर कहा - आज नाथ योगी अपने आसन पर नहीं हैं । उनका देहांत हो गया है । इसी से सींगी नहीं बजी है । वास्तव में हमारी शीरीरिक क्रिया करने का समय हो गया है । फिर सूर्योदय होने पर सब को ज्ञात हो गया कि नाथजी की देहान्त हो गया है । किन्तु दादूजी ने ब्राह्ममुहूर्त में ही अपने शिष्य को बता दिया था । सो दादूजी की योग शक्ति का द्योतक है ।
(क्रमशः)

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