#daduji
श्री दादूवाणी आनन्दलहरी ~ ५
http://youtu.be/lSL9OBn7nA0
जरणा का अंग ~ ५
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ १ ॥
को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।
गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ॥ २ ॥
जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।
रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ॥ ३ ॥
दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ४ ॥
दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ ।
दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ ५ ॥
कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने ।
दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ ६ ॥
दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ७ ॥
लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ ।
कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ ८ ॥
सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ ।
कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ ९ ॥
सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया ।
दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ १० ॥
सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा ।
दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ ११ ॥
सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला ।
दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ १२ ॥
सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास ।
दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ १३ ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै ।
दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ १४ ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ ।
दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ १५ ॥
अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै ।
दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ १६ ॥
अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि ।
दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ १७ ॥
जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ १८ ॥
जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ १९ ॥
जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै ।
दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ २० ॥
जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत ।
दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ २१ ॥
जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव ।
जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ २२ ॥
जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं ।
जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ २३ ॥
जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख ।
जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ २४ ॥
जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार ।
जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ २५ ॥
जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार ।
जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ २६ ॥
जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार ।
जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ २७ ॥
दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त ।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ २८ ॥
दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।
जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ २९ ॥
दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।
जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ ३० ॥
दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण ।
औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ ३१ ॥
दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध?
मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ ३२ ॥
पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास ।
चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ ३३ ॥
चौदह तीनों लोक सब, ठूंगे श्वासै श्वास ।
दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ ३४ ॥
दिव्य प्रेरणा ~ महंत महामंडलेश्वर सन्त श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
साभार ~ अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज, दिल्ली
श्री दादूवाणी आनन्दलहरी ~ ५
http://youtu.be/lSL9OBn7nA0
जरणा का अंग ~ ५
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ १ ॥
को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।
गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ॥ २ ॥
जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।
रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ॥ ३ ॥
दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ४ ॥
दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ ।
दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ ५ ॥
कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने ।
दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ ६ ॥
दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ७ ॥
लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ ।
कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ ८ ॥
सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ ।
कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ ९ ॥
सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया ।
दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ १० ॥
सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा ।
दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ ११ ॥
सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला ।
दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ १२ ॥
सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास ।
दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ १३ ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै ।
दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ १४ ॥
अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ ।
दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ १५ ॥
अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै ।
दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ १६ ॥
अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि ।
दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ १७ ॥
जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ १८ ॥
जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ १९ ॥
जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै ।
दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ २० ॥
जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत ।
दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ २१ ॥
जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव ।
जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ २२ ॥
जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं ।
जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ २३ ॥
जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख ।
जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ २४ ॥
जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार ।
जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ २५ ॥
जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार ।
जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ २६ ॥
जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार ।
जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ २७ ॥
दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त ।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ २८ ॥
दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।
जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ २९ ॥
दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।
जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ ३० ॥
दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण ।
औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ ३१ ॥
दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध?
मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ ३२ ॥
पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास ।
चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ ३३ ॥
चौदह तीनों लोक सब, ठूंगे श्वासै श्वास ।
दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ ३४ ॥
दिव्य प्रेरणा ~ महंत महामंडलेश्वर सन्त श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
साभार ~ अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज, दिल्ली

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