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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/१९*
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*दादू काया कारवीं, कदे न चाले संग ।*
*कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥१९॥*
दृष्टांत -
च्यार पुरुष भाड़े लई, बणिक कोठरी च्यार ।
कहि भाड़ा हमरा यही, कबहु देऊ निकार ॥२॥
चार पुरुषों ने एक वैश्य से चार कोठरी किराये पर मांगी । वैश्य ने कहा - मेरा किराया यही है कि मैं जब चाहूँ तब ही खाली करा लूंगा । उक्त शर्त पर वे चारों चार कोठरियों में रहने लगे । उनमें से एक ने अपनी कोठरी में बहुत सामान ला लाकर भर दिया । दूसरे ने खाने पीने का सामान ही अपनी कोठरी में रक्खा । तीसरे ने ओढने बिछाने के कपड़े ही रखे और चौथा अपनी कोठरी में रखता कु़छ भी नहीं था केवल विश्राम ही करता था ।
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एक दिन वैश्य ने कहा - आज सभी कोठरियां खाली करो । तब प्रथम पुरुष को बड़ा दुःख हुआ । दूसरे को उससे कम दुःख हुआ तीसरे को अपने कपड़े उठाने का परिश्रम ही हुआ और चौथे को परिश्रम कु़छ नहीं हुआ, उठकर चल दिया ।
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तात्पर्य यह है - प्रारब्ध रूप वैश्य से शरीर रूप कोठरियां मिलती हैं । प्रारब्ध समाप्त होते ही कोठरियां छोड़नी पड़ती हैं । पामर, विषयी, जिज्ञासु और भक्त ये चार पुरुष हैं । पामर की शरीर में अधिक आसक्ति होने से छोड़ते समय बहुत दुःख होता है ।
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विषयी मर्यादा में चलता है । अतः उसकी आसक्ति शरीर में कम होनेसे देह उसे त्यागते समय दुःख भी पामर से कम ही होता है । जिज्ञासु को जिज्ञासा पूर्ण न होने का विक्षेप ही होता है और भक्त को देह त्यागते समय दुःख नहीं होता । सोई उक्त १९ की साखी में कहा है कि काया पथिक विश्राम के समान है, इसमे आसक्ति नहीं करके हरि भजन ही करना चाहिये ।

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