सोमवार, 28 अप्रैल 2014

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#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
नाम न आवै तब दुखी, आवै सुख संतोष ।
दादू सेवक राम का, दूजा हर्ष न शोक ॥ 
मिले तो सब सुख पाइये, बिछुरे बहु दु:ख होइ ।
दादू सुख दु:ख राम का, दूजा नाहीं कोइ ॥ 
दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माहिं ।
संगि सदा आनन्द करै, बिछुरत ही मर जाहिं ॥ 
दादू राम बिसार कर, जीवैं किहिं आधार ।
ज्यूं चातक जल बूँद को, करै पुकार पुकार ॥ 
हम जीवैं इहि आसरे, सुमिरण के आधार ।
दादू छिटके हाथ थैं, तो हमको वार न पार ॥ 
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नाम-जप की महिमा ~
प्रश्न‒शास्त्रों, सन्तों ने भगवन्नाम की जो महिमा गायी है, वह कहाँ तक सच्ची है?

उत्तर‒शास्त्रों और सन्तोंने नाम की जो महिमा गायी है, वह पूरी सच्ची है । इतना ही नहीं, आजतक जितनी नाम-महिमा गायी गयी है, उससे नाम-महिमा पूरी नहीं हुई है, प्रत्युत अभी बहुत नाम-महिमा बाकी है । कारण कि भगवान् अनन्त हैं; अत: उनके नाम की महिमा भी अनन्त है‒‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’(मानस १।१४०।३) । नाम की पूरी महिमा स्वयं भगवान् भी नहीं कह सकते‒‘रामु न सकहिं नाम गुन गाई’ (१।२६।४) ।

प्रश्न‒नाम की जो महिमा गायी गयी है, वह नामजप करनेवाले व्यक्तियों में देखने में नहीं आती, इसमें क्या कारण है ?

उत्तर‒नाम के माहात्म्य को स्वीकार न करने से नाम का तिरस्कार, अपमान होता है; अत: वह नाम उतना असर नहीं करता । नाम-जप में मन न लगाने से, इष्ट के ध्यान सहित नाम-जप न करने से, हृदय से नाम को महत्त्व न देने से, आदि-आदि दोषों के कारण नाम का माहात्म्य शीघ्र देखने में नहीं आता । हाँ, किसी प्रकार से नाम-जप मुख से चलता रहे तो उससे भी लाभ होता ही है, पर इसमें समय लगता है । मन लगे चाहे न लगे, पर नामजप निरन्तर चलता रहे कभी छूटे नहीं तो नाम-महाराज की कृपा से सब काम हो जायगा, अर्थात् मन लगने लग जायगा, नामपर श्रद्धा-विश्वास भी हो जायँगे, आदि- आदि ।

अगर भगवन्नाम में अनन्यभाव हो और नाम-जप निरन्तर चलता रहे तो उससे वास्तविक लाभ हो ही जाता है; क्योंकि भगवान्‌ का नाम सांसारिक नामों की तरह नहीं है । भगवान् चिन्मय हैं; अत: उनका नाम भी चिन्मय(चेतन) है । राजस्थान में बुधारामजी नामक एक सन्त हुए हैं । वे जब नाम-जप में लगे, तब उनको नाम-जप के बिना थोड़ा भी समय खाली जाना सुहाता नहीं था । जब भोजन तैयार हो जाता, तब माँ उनको भोजन के लिये बुलाती और वे भोजन करके पुन: नाम-जप में लग जाते । एक दिन उन्होंने माँ से कहा कि माँ ! रोटी खाने में बहुत समय लगता है; अत: केवल दलिया बनाकर थाली में परोस दिया कर और जब वह थोड़ा ठण्डा हो जाया करे, तब मेरे को बुलाया कर । माँ ने वैसा ही किया । एक दिन फिर उन्होंने कहा कि माँ ! दलिया खाने में भी समय लगता है; अत: केवल राबड़ी बना दिया कर और जब वह ठण्डी हो जाया करे, तब बुलाया कर । इस तरह लगन से नाम-जप किया जाय तो उससे वास्तविक लाभ होता ही है ।

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