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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग ३३ वां दिन -*
३३ वें दिन अकबर ने पू़छा - स्वामिन् ! वास्तविक स्थिति को प्राप्त करने वाले महात्माओं का देश कौनसा है ? वे जहां रहते हैं, वह कितनी दूर है ? यह मुझे बताने की कृपा करें ।
दादूजी ने कहा -
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एक देश हम देखिया, जहां ॠतु नहिं पलटे कोय ।
हम दादू उस देश के, जहां सदा एक रस होय ॥२२॥
एक देश हम देखिया, जहँ बस्ती ऊजड़ नांहिं ।
हम दादू उस देश के, सहज रूपता मांहिं ॥२३॥
एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर ।
हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥२४॥
(मध्य अंग १६)
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को साधू जन उस देश का, आया इहिं संसार ।
दादू उसको पू़छिये, प्रीतम के समचार ॥९५॥
समाचार सत पीव का, को साधू कहगा आय ।
दादू शीतल आत्मा सुख में रहे समाय ॥८९॥
(पाठान्तर)
तहाँ राम - रस पाइये, जहाँ साधु तहँ जाय ॥९६॥
(साधु अंग १५)
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उक्त उपदेश से अकबर को महान् आनन्द हुआ । उसने दादूजी को बारंबार धन्यवाद देकर पू़छा - भगवन् ! तत्व कितने हैं ? मुसलमान तो चार ही तत्व मानते हैं किन्तु हिन्दुओं में नाना मत है, वे पांच से लेकर २६ तक कहते हैं और कोई २६ से भी अधिक बताते हैं । अतः आप कितने तत्व मानते हैं बताइये । दादूजी ने तब कहा -
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एक तत्व ता ऊपरि इतनी, तीन लोक ब्रह्मंडा ।
धरती गगन पवन अरु पाणी, सप्तद्वीप नौ खंडा ॥५॥
चंद सूर चौरासी लख तारा, दिन अरु रैणी, रचले सप्त संमदा ।
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, अठारह भार तीर्थ व्रतता ऊपर मंडा ॥६॥
चौदह लोक रहैं सब रचना, दादूदास तासु घर बंदा ॥७॥
(पीव पहचान अंग २०)
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उक्त प्रकार एक तत्व से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक भी हो जाता है । एक अथवा अनेक विद्वान बताते हैं, वैसे ही घटाकर समझा देते हैं । वास्तव में एक परमात्मारूप तत्व ही सत्य है । फिर सत्संग का समय समाप्त हो जाने से अकबर आदि प्रणाम करके चले गये ।

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