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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग ३४ वां दिन -*
अकबर बादशाह ने पू़छा - भगवन् ! सभी हिन्दू मूर्ति पूजा करते हैं, आप मूर्ति पूजा क्यों नहीं करते है ? यह सुनकर दादूजी बोले -
मायारुपी राम को, सब कोई ध्यावे ।
अलख आदि अनादि है, सो दादू गावे ॥१३७॥
ब्रह्मा का वेद विष्णु को मूर्ति, पूजे सब संसारा ।
महादेव को सेवा लागे, कहां है सिरजनहारा ॥१३८॥
माया का ठाकुर किया, माया की महामाइ ।
ऐसे दैव अनन्त कर, सब जग पूजन जाइ ॥१३९॥
माया बैठी राम हो, ताको लखे न कोहि ।
सब जग माने सत्य कर, बड़ा अचम्भा मोहि ॥१४०॥
*अंजन किया निरंजना, गुण निर्गुण जाणे ।*
*धर्या दिखावे अधर कर, कैसे मन माने ॥१४२॥*
निरंजन की बात कह, आवे अंजन मांहिं ।
दादू मन माने नहीं, स्वर्ग रसातल जांहिं ॥१४३॥
सकल भुवन भाने घड़े, चतुर चलावनहार ।
दादू सो सूझे नहीं, जिसका वार न पार ॥१५१॥
(माया अंग १२)
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इत्यादिक साखियों द्वारा उपदेश सुनकर अकबर बादशाह बोला - भगवन् मैं आपका आशय समझ गया हूँ कि जिनको निर्गुण निराकार परब्रह्म का ज्ञान नहीं वे लोग ही सगुण साकार की उपासना करते हैं । इतना कहकर बादशाह ने अनेक प्रणाम किये । फिर सत्संग समाप्त हो गया तब सब चले गये ।

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