गुरुवार, 11 सितंबर 2014

**सीकरी प्रसंग १९ वां दिन**

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**सीकरी प्रसंग १९ वां दिन**
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अकबर ने कहा - भगवन् ! जिज्ञासु के लक्षण कहने की कृपा कीजिये ? दादूजी ने कहा - चार साधनों से युक्त और परब्रह्म को जानना चाहता हो उसे ही जिज्ञासु कहते हैं । अकबर - वे चार साधन कौन से हैं ? दादूजी - १ - विवेक, २ - वैराग्य, ३ - शमादिषट्सम्पति, ४ - मुमुक्षता ।
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अकबर - इनके भिन्न - भिन्न लक्षण कहने की कृपा करें ? तब दादूजी ने कहा -
हंस गियानी सो भला, अंतर राखे एक ।
विष में अमृत काढिले, दादू बड़ा विवेक ॥३॥
(सारग्राही अंग १७)
इसी को विवेक कहते हैं ।
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वैराग्य भी सुनिये -
दादू सूक्ष्म मांहिंले, तिन का कीजे त्याग ।
सब तज राता राम से, दादू यहु वैराग ॥१९॥
(विचार अंग १८)
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शमदम - 
उत्तम इन्द्रिय निग्रहं, मुच्यते माया मनः ।
परम पुरुष पुरातन, चिंतते सदा तनः ॥६१॥
(स्म. अंग २)
श्रद्धा - 
सद्गुरु कहै सु कीजिये, जे तु शिष्य सुजाण ।
जहां लाया तहं लाग रहु, बूझे कहा अजाण ॥१०८॥
(गुरु अंग १)
समाधान - 
जब मन मृतक हो रहे, इंन्द्रिय बल भागा ।
सांई सेती संग कर, सहज सुरति ले पूर ॥२४॥
(लै अंग ७)
तितिक्षा - 
विपत भली हरिनाम से, काया कसौटी दुःख ।
राम बिना किस काम का, दादू संपत्ति सुःख ॥४१॥
(विश्वास अंग १९)
मुमुक्षता - 
जिन हम सिरजे सो कहां, सद्गुरु देहु दिखाय ।
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यो साय ॥४२॥
(गुरु अंग १)
क्षुधा तृषा क्यों भूलिये, शीत तपत क्यों जाय ।
क्यों सह छूटे देह गुण, सद्गुरु कह समझाय ॥२२॥
(विचार अंग १८)
मुझ ही में मेरा धणी, पड़दा खोल दिखाय ।
आतम से परआतमा, परगट आणि मिलाय ॥४३॥
साक्षात्कार -
सद्गुरु कहै सु शिष करे, सब सिध कारज होय ।
अमर अभय पद पाइए, काल न लागे कोय ॥९७॥
(गुरु अंग १)

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