सोमवार, 15 सितंबर 2014

**सीकरी प्रसंग २२ वां दिन**

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**सीकरी प्रसंग २२ वां दिन**
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२२ वें दिन अकबर ने पू़छा - भगवन् ! आपने गत दिन के प्रवचन में कहा था - देह को यत्न द्वारा स्थिर रखते हैं किन्तु मन स्थिर नहीं रहता सो आसन मारकर मौन धारण करके बैठ जाने पर मन स्थिर हो ही जायगा क्यों न होगा ?
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दादूजी ने कहा -
*काया राखे बंद दे, मन दह दिशि खेले ।*
*दादू कनक रु कामिनी, माया नहिं मेले ॥७६॥*
मन से मीठी मुख से खारी, माया त्यागी कहै बाजारी ॥७६॥
अकबर - जो माया त्याग कर देते है, उनका तो हो ही जाता होगा ?
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दादूजी -
घट मांहीं माया घणी, बाहर त्यागी होय ।
फाटी कंथा पहर कर, चिह्न करे सब कोय ॥७५॥
(माया अंग १२)
अकबर - कपट का परिणाम क्या होता है ?
दादूजी -
सांचे मत साहिब मिलैं, कपट मिलेगा काल ।
सांच परमपद पाइये, कपट काया में साल ॥७५॥
(काल अंग २५)
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अकबर - दंभियों का अनुकरण करने से क्या होता है ?
दादूजी बोले -
देखा देखी सब चलें, पार न पहुँचा जाय ।
दादू आसन पहल के, फिर - फिर बैठे आय ॥१०९॥
(मन अंग १०)
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अकबर - प्राणियों को कर्म का फल कैसे मिलता है ।
दादूजी – मन की वासना अनुसार -
जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुंचे जाय ।
दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आय ॥१०५॥
(मन अंग १०)
फिर मन के विषयक अनेक विचार व्यक्त करके सत्संग समाप्त कर दिया ।

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