रविवार, 14 सितंबर 2014

= ९७ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
दादू सब देखैं अस्थूल को, यहु ऐसा आकार । 
सूक्ष्म सहज न सूझई, निराकार निरधार ॥ 
निरंजन निराकार है, ओंकार आकार । 
दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 
दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव । 
जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ॥ 
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साभार : बिष्णु देव चंद्रवंशी ~ 
●●●●|||| == भक्ति == ||||●●●●

जो निराकार है वही साकार होता है। स्थिर प्रशान्त महासमुद्र ही तरंग के रूप में ऊपर उठकर दिखलाई पड़ता है। जैसे तरंग समुद्र की सीमा से बाहर चली गई मालूम पड़ती है और फिर लौटकर समुद्र में विलीन हुई प्रतीत होती है, उसी प्रकार निर्गुण निराकार व्यापक परमात्मा हो सगुण साकार रूप लेकर एक देश में आते हैं।
हम तो यह कहेंगे कि भगवान् के साकार रूप में प्रकट होने से ही निराकार परमात्म - सत्ता की प्रत्यक्ष सिद्धि होती है। काष्ठ में अग्नि सर्वत्र है, यह तभी प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध होता है जब किसी स्थल को रगड़ने से वहाँ अग्नि प्रकट हो जाता है। सिद्धान्त यही है कि निर्गुण निराकार ही सगुण साकार होता है और सगुण साकार से ही निर्गुण निराकार की प्रत्यक्ष सिद्ध होती है। 
अतः निराकार-साकार के झगड़ों में न पड़कर कहीं भी अपने मन को जमाओ। निष्ठा जमाने से ही कल्याण होगा। निराकार और साकार के सम्बन्ध में झगड़ा मचाने से कोई लाभ नहीं।तुम चाहे निराकार पर सील लगाओ या साकार पर, उससे निराकार या साकार का कुछ बने - बिगड़ेगा नहीं। अपने कल्याण के लिए कहीं भी निष्ठा जमाने का प्रयत्न करो। 
किसी सद्गुरू से अपने अधिकारानुसार उपयुक्त उपासना का प्रकार समझ कर उपासना कर चलो और विधान पूर्वक आत्मा या पर्मात्मा में निष्ठा जमाने का अभ्यास करो। साकार में भी निष्ठा पुष्ट हो जायगी तो भी जन्म - मरण का बंधन कट जायगा और लोक में भी सुख - शान्ति से जीवन बीतेगा। 
श्री कृष्ण हरी !! 
जयति सनातन संस्कृति जयति भारत

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