शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

#daduji

||दादूराम सत्यराम||
देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।
दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥ १७ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! जिसने तीन लोक और चौदह भवन रचे हैं, वही समर्थ इनमें निवास करने वाले, जीवों को प्रारब्ध – कर्मानुसार, देते - लेते हैं । परन्तु अनन्य भक्त तो अन्तःकरण रूपी महल में, निष्काम स्मरण रूप सेवा में लगे हैं और संसार में सभी लोग, उन भक्तों की शोभा करते हैं ॥ १७ ॥

कर्ता साक्षीभूत ~
दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।
सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥ १८ ॥
इति साक्षीभूत का अंग सम्पूर्णः ३५ ॥ साखी १८ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! वह जाणराइ अन्तर्यामी, घट - घट की जानने वाले परमात्मा, आप स्वयं सम्पूर्ण बाजी रचकर आप ही खिलाड़ी बन रहे हैं । किन्तु अज्ञानरूप आवरण होने से, साधारण प्राणी उसको देख नहीं सकते और वह आप स्वयं कूटस्थ चैतन्य, सबको जीत कर साक्षीरूप से स्थित हो रहे हैं । और किसी भी बन्धन से वे बँधे हुए नहीं हैं ॥ १८ ॥

इति साक्षीभूत का अंग टीका सहित सम्पूर्णः ३५ ॥ साखी १८ ॥

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